कहानी: मेरी दुनिया

बेटी की शादी के कार्ड छप चुके थे, लेकिन घर के आँगन में बैठा सुरेश बार-बार कैलकुलेटर पर उंगलियाँ चला रहा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं। सामने मेज पर बैंक के कागज़, कुछ उधार की पर्चियाँ और बेटी अन्वी की शादी का खर्च लिखी हुई एक डायरी खुली पड़ी थी।



"मैंने कह दिया है, अब और पैसे की उम्मीद मत रखना।" सुरेश की पत्नी ममता ने नाराज़ स्वर में कहा। "तुम्हारे छोटे भाई के परिवार पर हम कब तक खर्च करते रहेंगे? हमारी भी जिम्मेदारियाँ हैं।"



सुरेश ने सिर उठाकर पत्नी की तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोला।



ममता पिछले कई महीनों से यही बात दोहरा रही थी।



सुरेश शहर में सरकारी नौकरी करता था। अच्छी तनख्वाह थी, अपना मकान था और समाज में इज्जत भी थी। लेकिन हर महीने उसकी तनख्वाह का एक हिस्सा गाँव चला जाता था, जहाँ उसका छोटा भाई रमेश अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था।



रमेश ने कभी शिकायत नहीं की।



वह खेत संभालता था, माँ की सेवा करता था और पैतृक घर को टूटने नहीं देता था।



लेकिन ममता को लगता था कि रमेश उनकी मेहनत का फायदा उठा रहा है।



"अन्वी की शादी है, सुरेश," ममता ने फिर कहा, "लोग क्या कहेंगे अगर शादी साधारण तरीके से हुई? तुम्हारे ऑफिस के बड़े-बड़े लोग आएँगे। हमें बैंक से लोन लेना पड़ेगा।"



"तो?" सुरेश ने धीमे स्वर में पूछा।



"तो गाँव वाला पुराना घर बेच देते हैं। वैसे भी वहाँ कौन रहता है? रमेश को थोड़ा पैसा दे देंगे। बाकी से शादी भी अच्छे से हो जाएगी और लोन लेने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।"



सुरेश चुप रहा।



ममता ने समझा कि वह मान गया है।



"मैंने प्रॉपर्टी डीलर से बात भी कर ली है," उसने उत्साहित होकर कहा। "अगले हफ्ते खरीदार देखने आएगा।"



सुरेश के हाथ से कैलकुलेटर छूट गया।



उसी समय उसका फोन बजा।



स्क्रीन पर रमेश का नाम चमक रहा था।



"हाँ रमेश।"



"भैया, माँ की तबीयत थोड़ी बिगड़ गई थी," रमेश ने हमेशा की तरह शांत और सहज आवाज़ में कहा, "डॉक्टर को दिखा दिया है। अब पहले से काफी ठीक हैं। आप बिल्कुल चिंता मत करना।"



सुरेश का मन बेचैन हो उठा।



"रमेश, दवाइयों और डॉक्टर का खर्चा हो गया होगा। पैसे हैं तुम्हारे पास?"



"हाँ भैया," रमेश ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया, "जितना है, उसमें काम चला लेंगे। आप परेशान मत होइए।"



"देखो, अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बिना सोचे मुझे बता देना।"



फोन के उस पार कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।



फिर रमेश ने झिझकते हुए पूछा, "भैया... अन्वी बिटिया की शादी की तैयारियाँ कैसी चल रही हैं?"



"बस..." सुरेश ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "जैसे-तैसे चल रही हैं। खर्चे उम्मीद से ज़्यादा बढ़ गए हैं।"



रमेश कुछ क्षण चुप रहा, मानो हिम्मत जुटा रहा हो।



"भैया," उसने धीमे स्वर में कहा, "मैंने पिछले कुछ समय से थोड़ा-थोड़ा करके कुछ पैसे जोड़े थे। ज़्यादा तो नहीं हैं, लेकिन अन्वी बिटिया मेरी भी बेटी जैसी है। अगर आपको ठीक लगे, तो उसके गहनों या शादी के किसी काम में लगा दीजिएगा।"



सुरेश के हाथ अनायास काँप उठे।



जिस भाई ने कभी अपनी परेशानियों का बोझ उस पर नहीं डाला, वही आज अपनी छोटी-सी जमा पूँजी उसकी बेटी की खुशियों पर न्योछावर करने को तैयार था।



सुरेश के गले में जैसे कुछ अटक गया।



काफी कोशिश के बाद वह बस इतना ही कह पाया—



"रमेश... तू हमेशा इतना बड़ा कैसे बन जाता है, जबकि खुद के लिए कभी कुछ नहीं माँगता?"



जिस आदमी को लेकर उसकी पत्नी सोचती थी कि वह बोझ है, वही अपनी छोटी-सी बचत बेटी की शादी में लगाने को तैयार था।



फोन रखने के बाद सुरेश सीधे गाँव चला गया।



पुराने घर में दाखिल होते ही उसने देखा कि रमेश आँगन में बैठकर माँ के पैरों में तेल लगा रहा था।



माँ की झुर्रियों भरी आँखों में बेटे को देखकर चमक आ गई।



"आ गया बेटा?" माँ मुस्कुराईं।



"हाँ माँ।"



सुरेश की नजर घर की दीवारों पर गई।



कई जगह से पलस्तर उखड़ चुका था।



रमेश के कपड़े पुराने थे।



लेकिन घर साफ-सुथरा था।



आँगन का तुलसी चौरा अब भी सजा हुआ था।



"भैया, खाना लगाऊँ?" रमेश ने पूछा।



सुरेश ने अचानक पूछा, "रमेश, तुम्हें कभी बुरा नहीं लगा?"



"किस बात का?"



"कि तुम गाँव में रह गए और मैं शहर चला गया।"



रमेश हँस पड़ा।



"भैया, अगर आप शहर नहीं जाते तो पिताजी का सपना कैसे पूरा होता? आपकी पढ़ाई के लिए खेत बिके, माँ के गहने बिके। आपने मेहनत की और आगे बढ़े। इसमें बुरा मानने वाली कौन-सी बात है?"



"लेकिन तुम्हारी पढ़ाई..."



रमेश ने बात काट दी।



"किसी एक को तो घर संभालना था। अगर मैं भी चला जाता तो माँ अकेली पड़ जातीं।"



सुरेश की आँखें भर आईं।



उसे वह दिन याद आ गया जब कॉलेज की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।



तब रमेश ने अपनी नई साइकिल बेच दी थी।



उसने हँसते हुए कहा था, "भैया, नौकरी लगने के बाद मुझे मोटरसाइकिल दिला देना।"



लेकिन नौकरी लगने के बाद जिंदगी की भागदौड़ में सुरेश वह वादा भूल गया था।



रात को खाना खाते समय सुरेश ने माँ से पूछा, "माँ, अगर यह घर बेच दें तो?"



माँ के हाथ रुक गए।



उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।



रमेश मुस्कुराकर बोला, "अगर जरूरत हो तो बेच दीजिए भैया। आखिर हिस्सा आपका भी है।"



उसकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी।



यही बात सुरेश को भीतर तक तोड़ गई।



अगले दिन शहर लौटकर उसने ममता से कहा, "वो घर नहीं बिकेगा।"



"क्या मतलब?" ममता चौंक गई।



"मतलब साफ है। अन्वी की शादी हमारी है, लेकिन उस घर की नींव में रमेश का त्याग भी जुड़ा है।"



"लेकिन खर्चे?"



"खर्चे कम कर देंगे। शादी सादगी से करेंगे।"



ममता झुंझला गई।



"लोग क्या कहेंगे?"



सुरेश की आवाज़ पहली बार कठोर हुई।



"जब मेरी फीस भरने के लिए रमेश ने अपनी जरूरतें छोड़ी थीं, तब उसने यह नहीं सोचा था कि लोग क्या कहेंगे। जब माँ ने अपने गहने बेचे थे, तब उन्होंने समाज की परवाह नहीं की थी। आज अगर मैं दिखावे के लिए अपना घर बेच दूँ, तो मैं जिंदगी भर खुद की नजरों में गिर जाऊँगा।"



ममता स्तब्ध रह गई।



"तुम्हें लगता है कि मैं अकेले अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँचा हूँ?" सुरेश ने कहा। "नहीं ममता। मेरी सफलता के पीछे माँ की अधूरी इच्छाएँ हैं, रमेश के अधूरे सपने हैं और उस घर की दीवारों की दुआएँ हैं।"



उसकी आँखों में आँसू थे।



"मैं अपनी बेटी की शादी खुशी से करूँगा, लेकिन उन रिश्तों की कीमत पर नहीं जिन्होंने मुझे खड़ा किया है।"



कमरे में सन्नाटा छा गया।



काफी देर बाद ममता धीरे से बोली,



"अगर... अगर शादी साधारण तरीके से करें तो क्या अन्वी को बुरा लगेगा?"



उसी समय दरवाजे पर खड़ी अन्वी मुस्कुरा दी।



"मम्मी, मुझे बड़ी शादी नहीं चाहिए। मुझे ऐसा परिवार चाहिए, जिस पर मुझे गर्व हो सके।"



ममता की आँखें भर आईं।



कुछ देर बाद उसने धीमे स्वर में कहा,



"सुनिए... अगले रविवार गाँव चलते हैं।"



"क्यों?"



"रमेश भैया की मोटरसाइकिल अभी तक नहीं आई ना?" ममता हल्का सा मुस्कुराई, "इतने साल देर हो गई है। अब वो वादा पूरा कर दीजिए।"



सुरेश उसे देखता रह गया।



अन्वी हँस पड़ी।



कई वर्षों से जमा हुई गलतफहमियाँ जैसे पिघलने लगीं।



अन्वी की शादी सादगी से हुई।



मेहमानों ने खाने की तारीफ की, अपनापन महसूस किया और सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हुई कि लड़की वालों के चेहरे पर बनावटी मुस्कान नहीं, सच्ची खुशी थी।



विदाई के समय माँ ने सुरेश और रमेश का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा,



"घर ईंटों से नहीं बनता बेटा। घर उन लोगों से बनता है जो एक-दूसरे का हिस्सा बनकर जीते हैं।"



आँगन में खड़ा पुराना नीम हवा के साथ झूम रहा था।



मानो वह भी गवाही दे रहा हो कि जिन रिश्तों की जड़ें त्याग और सम्मान में धँसी हों, उन्हें कोई आँधी कभी गिरा नहीं सकती।



क्योंकि विरासत सिर्फ जमीन-जायदाद नहीं होती।



विरासत वह प्रेम होता है, जो एक पीढ़ी अपने हिस्से की खुशियाँ छोड़कर अगली पीढ़ी की हथेलियों में रख जाती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ