कहानी: नई शुरुआत

रात के ग्यारह बज चुके थे। रसोई में बर्तनों की खड़खड़ाहट अभी भी शांत नहीं हुई थी। "आरव, बेटा जल्दी से दूध पीकर सो जा। सुबह तेरी बुआ आने वाली हैं, मुझे बहुत सुबह उठकर सारी तैयारियां करनी हैं।" गरिमा ने अपने आठ साल के बेटे को प्यार से डांटते हुए कहा।
"मम्मा, आप हमेशा बुआ के आने से पहले इतना थक क्यों जाती हो? कल तो राखी का त्योहार है, आपको भी तो एन्जॉय करना चाहिए ना," आरव ने अपनी मासूमियत से पूछा।
तभी पीछे से गरिमा के पति समीर कमरे में दाखिल हुए। "बिल्कुल सही कह रहा है आरव। जब भी दीदी को आना होता है, तुम ऐसे मशीन की तरह काम करने लगती हो जैसे कोई वीआईपी आ रहा हो। तुम इतना तनाव क्यों लेती हो? दीदी ही तो आ रही हैं।"
गरिमा ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहा, "तनाव दीदी के आने का नहीं होता समीर, बल्कि इस बात का होता है कि कहीं कोई चूक ना हो जाए। माँ जी की नजरों में दीदी के लिए किए गए इंतजाम में कोई कमी नहीं होनी चाहिए। अगर जरा सा भी कुछ उन्नीस-बीस हुआ, तो महीनों तक मुझे ताने सुनने पड़ेंगे।"
समीर ने गरिमा के कंधे पर हाथ रखा, "तुम बेकार में चिंता करती हो। माँ थोड़ी सख्त हैं, पर दिल की बुरी नहीं हैं। तुम सो जाओ अब, बाकी का काम कल मैं करवा दूंगा।"
गरिमा सिर्फ सिर हिलाकर रह गई। वह जानती थी कि सुबह उठते ही जो तूफान आएगा, उसे उसी को संभालना है।
अगली सुबह, सूरज निकलने से पहले ही गरिमा उठ गई थी। उसने पूरे घर की सफाई की और रसोई में जाकर छोले, पनीर, पुलाव, खीर और तरह-तरह के पकवान बनाने में जुट गई। सुबह के आठ बजते ही उसकी सास, सुमित्रा जी की भारी आवाज गूंजने लगी। "गरिमा! ओ गरिमा! बाहर आना जरा। दीदी के लिए जो शगुन का सामान देना है, वो निकाल कर ला।"
गरिमा अपने पसीने से भीगे चेहरे को पोंछते हुए बाहर आई। उसने रात को ही सारा सामान सलीके से सजा कर रख दिया था। सुमित्रा जी ने एक-एक डिब्बा खोलकर देखना शुरू किया।
"ये क्या? तुमने सिर्फ ये चार डिब्बे मिठाई के रखे हैं? और ये जो कल तुम्हारे भाई ने तुम्हारे लिए बनारस से खास काजू-बादाम का डिब्बा भेजा था, वो कहाँ है?" सुमित्रा जी ने त्यौरियां चढ़ाते हुए पूछा।
"माँ जी, वो... वो तो मेरे भाई सौरभ ने मेरी राखी के लिए खास तौर पर भेजा था। उसने अपनी पहली तनख्वाह से..." गरिमा की आवाज थोड़ी कांपने लगी।
"तो क्या हुआ? बहू का मायका और हमारा घर अब एक ही तो है। और वैसे भी, वो बनारसी साड़ी जो तुम्हारे मायके से आई है, वो भी ले आना। मेरी बेटी नमिता को गुलाबी रंग बहुत पसंद है। वो साड़ी उस पर खूब जंचेगी। तुम्हारे पास तो वैसे भी बहुत साड़ियां हैं। बेटी ससुराल जाती है तो हाथ भर कर देना चाहिए, तभी मायके की इज्जत होती है। और तुम्हारे मायके वालों का दिया हुआ सामान हम अपनी बेटी को देंगे, तो इसमें भगवान हमें ही बरकत देगा।" सुमित्रा जी ने बड़ी ही सहजता से गरिमा की भावनाओं को कुचल दिया।
गरिमा का दिल धक से रह गया। वह साड़ी सिर्फ एक कपड़ा नहीं था, वह उसके छोटे भाई के प्यार और उसकी मेहनत की निशानी थी। लेकिन इस घर में बहू की भावनाओं का कोई मोल कहाँ था? उसने चुपचाप जाकर अपने कमरे से वह साड़ी और मेवे का डिब्बा लाकर सुमित्रा जी के सामने रख दिया। समीर यह सब देख रहा था, पर वह अपनी माँ के सामने कुछ नहीं बोल पाया। उसने बस अपनी नजरें चुरा लीं।
दोपहर के समय घर में रौनक आ गई। नमिता अपनी पति कुणाल और बेटे लक्ष्य के साथ घर पहुंची। पूरे घर में हंसी-ठिठोली गूंजने लगी। गरिमा ने मुस्कुराते हुए सबका स्वागत किया और अपने हाथों से बनाए हुए लजीज पकवान परोसे।
खाना खाते हुए कुणाल ने तारीफ की, "वाह भाभी! आपके हाथों में तो जादू है। मैं तो हमेशा नमिता से कहता हूँ कि आपके जैसी खीर और पनीर पूरे शहर में कोई नहीं बना सकता।"
"बिल्कुल सही कहा पापा," लक्ष्य ने भी हामी भरी। नमिता ने भी खुश होकर कहा, "सच में भाभी, आपने तो कमाल कर दिया। मैं तो हमेशा आपके घर आने का बहाना ढूंढती हूँ।"
गरिमा ने बस हाथ जोड़कर मुस्कुरा दिया, लेकिन उसकी आँखों की वह नमी उसके दिल का हाल बयां कर रही थी, जिसे कोई नहीं पढ़ पा रहा था।
शाम को राखी बांधने का समय हुआ। नमिता ने अपने भाई समीर की कलाई पर प्यार से राखी बांधी और आरती उतारी। समीर ने अपनी बहन को आशीर्वाद दिया। इसके बाद सुमित्रा जी ने शगुन के लिफाफे और उपहारों से भरे बैग नमिता के सामने रख दिए।
"ये ले बेटा, तेरी भाभी ने तेरे लिए बड़ी मेहनत से ये सब तैयार किया है," सुमित्रा जी ने गरिमा की तरफ इशारा करते हुए कहा।
नमिता ने उत्सुकता से बैग खोला। सबसे ऊपर वही गुलाबी बनारसी साड़ी रखी थी। उसे देखते ही नमिता की आंखें चमक उठीं। "वाह माँ! ये तो बहुत ही खूबसूरत है। एकदम असली बनारसी सिल्क। लेकिन माँ, कल ही मेरी बात सौरभ से हुई थी। उसने मुझे बताया था कि उसने अपनी पहली सैलरी से गरिमा भाभी के लिए एक गुलाबी बनारसी साड़ी खरीदी है। उसने मुझे फोटो भी भेजी थी। ये तो बिल्कुल वैसी ही है।"
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी का चेहरा देखने लायक था। समीर ने नजरें नीचे कर लीं और गरिमा अपनी साड़ी का पल्लू उंगलियों में लपेटने लगी।
तभी आठ साल का आरव बोल पड़ा, "हां बुआ! ये वही साड़ी है जो सौरभ मामा ने मम्मा के लिए भेजी थी। और वो ड्राई फ्रूट्स भी। दादी ने आज सुबह मम्मा से कहा कि ये सब आपको दे देंगी क्योंकि आपको गुलाबी रंग पसंद है।"
बच्चे की इस मासूम सच्चाई ने कमरे की हवा को भारी कर दिया। सुमित्रा जी शर्मिंदगी से नजरें चुराने लगीं।
नमिता ने साड़ी वापस बैग में रखी और गहरी सांस लेकर अपनी माँ की तरफ देखा। "माँ, ये आपने क्या किया? क्या आप जानती हैं कि एक मायके से आई हुई चीज एक औरत के लिए क्या मायने रखती है? मेरे सास-ससुर भी कभी-कभी ऐसा करते हैं। जब आप मुझे प्यार से कोई चीज भेजती हैं और मेरी सास उसे अपनी किसी रिश्तेदार को दे देती हैं, तो मेरा दिल कितना रोता है, ये मैं ही जानती हूँ। मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे माँ-बाप के प्यार का अपमान हो गया हो।"
सुमित्रा जी ने सफाई देने की कोशिश की, "बेटा, वो तो बस... मैंने सोचा कि घर की ही तो बात है। बहू की चीज है, तुझे दे दूंगी तो क्या फर्क पड़ेगा।"
"बहुत फर्क पड़ता है माँ," नमिता की आवाज में एक दृढ़ता थी। "एक भाई ने अपनी बहन के लिए कितनी चाहत से ये साड़ी खरीदी होगी। जैसे समीर का दिया हुआ उपहार मेरे लिए अनमोल है, वैसे ही सौरभ का दिया हुआ उपहार भाभी के लिए अनमोल है। आप अपनी बेटी को खुश करने के लिए किसी और की बेटी का दिल कैसे दुखा सकती हैं? क्या भाभी इस घर की बेटी नहीं हैं?"
नमिता अपनी जगह से उठी। उसने वह गुलाबी बनारसी साड़ी और मेवे का डिब्बा उठाया और गरिमा के पास गई। उसने प्यार से वह साड़ी गरिमा के कंधों पर रख दी।
"भाभी, इस पर सिर्फ आपका हक है। ये आपके भाई का प्यार है और इसे आपसे छीनने का हक किसी को नहीं है। मुझे माफ कर दीजिएगा कि मेरी वजह से आज आपका दिल दुखा।" नमिता ने गरिमा को गले लगा लिया।
गरिमा के आंसुओं का बांध टूट गया। उसने जो सम्मान और अपनापन हमेशा इस घर में चाहा था, आज वह उसे अपनी ननद से मिल रहा था।
समीर भी आगे आया और उसने अपनी माँ से कहा, "माँ, नमिता सही कह रही है। आज आपने जो किया वह गलत था। मैंने सुबह सब कुछ देखा पर मैं चुप रहा, ये मेरी सबसे बड़ी गलती थी। गरिमा इस घर की बहू होने के साथ-साथ इस घर की इज्जत भी है। उसके मायके का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है।"
सुमित्रा जी को अपनी गलती का गहरा अहसास हो चुका था। उनकी आँखों में भी आंसू आ गए। उन्होंने गरिमा के पास आकर उसके सिर पर हाथ रखा, "मुझे माफ कर दे बहू। अपनी बेटी के मोह में मैं भूल गई कि तू भी किसी की बेटी है। आज से तेरे मायके की हर चीज पर सिर्फ तेरा हक है।"
उस दिन राखी का त्योहार सही मायनों में मनाया गया। रिश्तों की कड़वाहट आंसुओं के साथ बह गई थी और उस घर में प्यार और सम्मान की एक नई शुरुआत हुई थी।

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