कहानी: सपनों के आसमान

चूल्हे पर रखे भगोने में चाय का पानी उबल रहा था और उसमें से उठती भाप के बीच सुमित्रा अपनी ही ख्यालों की दुनिया में खोई हुई थी। आज घर में गजब की गहमागहमी थी। सुमित्रा इस घर की मंझली बहू थी और आज घर में उसके देवर की नई-नवेली दुल्हन, यानी घर की छोटी बहू कदम रखने वाली थी। अदरक और इलायची को कूटते हुए सुमित्रा के होंठों पर एक हल्की सी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। मन ही मन वह सोच रही थी कि चलो, अब छोटी देवरानी आ जाएगी तो घर के इस अथाह काम से उसे थोड़ी तो मोहलत मिलेगी। शादी के इन सात सालों में उसने शायद ही कभी अपने लिए चैन की सांस ली हो। 
सुबह उठने से लेकर रात के बारह बजे तक बस रसोई, बर्तन, कपड़े, सास-ससुर की दवाइयां और बच्चों की जिम्मेदारियों में वह कोल्हू के बैल की तरह जुती रहती थी।
सुमित्रा को किताबें पढ़ने और कविताएं लिखने का बेइंतहा शौक था। जब वह मायके में थी, तो उसकी कविताओं की डायरी कभी उसके सिरहाने से अलग नहीं होती थी। उसे आज भी याद है, एम.ए. हिंदी साहित्य में उसने पूरे विश्वविद्यालय में टॉप किया था। उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। वे तो चाहते थे कि उनकी बेटी आगे चलकर प्रोफेसर बने, अपने पैरों पर खड़ी हो। लेकिन सुमित्रा की किस्मत की लकीरें शायद उसकी डिग्रियों से नहीं, बल्कि उसकी त्वचा के रंग से तय होने वाली थीं। सुमित्रा का रंग सांवला था, बल्कि यूं कहें कि थोड़ा पक्का सांवला था। उसकी माँ हमेशा इसी बात को लेकर फिक्रमंद रहती थीं। 

जब सुमित्रा के लिए एक खाते-पीते, संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार से रिश्ते का प्रस्ताव आया, तो माँ ने तुरंत हामी भर दी। पिता ने थोड़ा विरोध किया कि बेटी को अभी और पढ़ना है, लेकिन माँ की दलीलों के आगे उनकी एक न चली। "रंग सांवला है जी, इतना अच्छा और बिना दहेज का रिश्ता बार-बार थोड़ी मिलेगा। लड़की ज्यादा पढ़-लिख जाएगी तो सांवले रंग के कारण उसके लायक पढ़ा-लिखा लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा। जो नसीब में है, उसे माथे लगाओ और बेटी के हाथ पीले कर दो।" बस, माँ के इन्हीं शब्दों ने सुमित्रा के सुनहरे सपनों को मायके की उसी पुरानी अलमारी में कैद कर दिया और वह एक बड़े से घर की 'मंझली बहू' बनकर आ गई।

"अरे मंझली बहू! चाय में क्या आज अपने ख्यालों की शक्कर घोल रही हो? मेहमान बाहर बैठे हैं और तुम्हारी चाय अभी तक चूल्हे से नहीं उतरी!" सासू मां, कौशल्या देवी की तेज और खनकती हुई आवाज ने सुमित्रा को उसके अतीत के झरोखे से झटके में खींचकर वर्तमान के यथार्थ में ला खड़ा किया।

सुमित्रा ने हड़बड़ाते हुए सिर पर खिसकते हुए पल्लू को पिन से कसा और फौरन गैस बंद कर दी। "जी मां जी, बस ले आई!" उसने जल्दी-जल्दी चाय को खूबसूरत कपों में छाना और ट्रे में सजाकर बाहर हॉल में बैठे रिश्तेदारों को परोसने लगी। इस बड़े से घर में जेठानी जी भी थीं, लेकिन वे एक बैंक में ऊंचे पद पर कार्यरत थीं, इसलिए सुबह-सुबह ही ऑफिस निकल जाती थीं। घर की सारी जिम्मेदारी सुमित्रा के ही कंधों पर थी। सबको चाय-नाश्ता देने के बाद, वह थके हुए कदमों से अपने कमरे की तरफ बढ़ी।
कमरे में आते ही उसकी नजर अपने दोनों बच्चों, सात साल के आरव और पांच साल के विहान पर पड़ी। दोनों भाई क्रीम कलर की शेरवानी और लाल साफे में सजे-धजे पलंग पर उछल-कूद कर रहे थे। आज उनके छोटे चाचा की शादी का रिसेप्शन और नई चाची का गृह प्रवेश जो था। अपने दोनों बच्चों को इस तरह सज-धज कर खुश होते देख सुमित्रा की सारी थकान पल भर में छूमंतर हो गई। वह मुस्कुराती हुई ड्रेसिंग टेबल के पास गई। उसने काजल की छोटी सी डिबिया खोली, अपनी अनामिका उंगली में थोड़ा सा काजल लिया और दोनों बेटों के कान के पीछे एक-एक छोटा सा काला टीका लगा दिया। "मेरे इन चांद के टुकड़ों को किसी की नजर न लगे," उसने बच्चों के माथे चूमते हुए बुदबुदाया।
बच्चों को बाहर भेजकर सुमित्रा ने अलमारी खोली। उसे भी तो तैयार होना था। उसने अपने लिए एक गहरे नीले रंग की बनारसी साड़ी निकाली थी, जिस पर सुनहरे तारों का बारीक काम था। यह रंग उस पर खिलता था, या कम से कम उसे ऐसा लगता था। साड़ी पहनने के बाद वह आईने के सामने आकर खड़ी हो गई। उसने अपनी मांग में गहरा लाल सिंदूर भरा और माथे के ठीक बीचों-बीच एक बड़ी सी मैरून बिंदी लगा ली। इसके बाद उसने अपनी नजरें अपने ही चेहरे पर टिका दीं। आईने में दिख रहा अक्स एक ऐसी औरत का था जिसकी कजरारी आंखें बहुत कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन होंठ खामोश थे। उसका सांवला रंग, जिसे समाज ने हमेशा एक 'कमी' माना था, आज भी उसे अंदर ही अंदर एक अजीब सी हीन भावना से भर देता था। उसने पाउडर का डिब्बा उठाया, फिर कुछ सोचकर वापस रख दिया।
तभी कमरे का दरवाजा खुला और उसकी जेठानी की दोनों बेटियां, पंद्रह साल की रिया और तेरह साल की स्नेहा, चहकती हुई अंदर दाखिल हुईं। दोनों ने सुंदर से लहंगे पहने हुए थे और उनके चेहरों पर आधुनिक मेकअप चमक रहा था।
"अरे चाची! ये क्या? आज घर में इतना बड़ा फंक्शन है, नई चाची घर आ रही हैं, और आपने बिल्कुल भी मेकअप नहीं किया? सिर्फ बिंदी और सिंदूर? कम से कम एक अच्छी सी लिपस्टिक तो लगा लीजिए!" रिया ने मुंह बनाते हुए कहा।
"हां चाची, आप हमेशा ऐसे ही सिंपल रहती हैं। आज तो हम आपको अच्छे से तैयार करके ही मानेंगे," स्नेहा ने भी रिया की हां में हां मिलाई और झट से अपना मेकअप किट खोलकर ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया।
रिया ने एक गहरे मैरून रंग की लिपस्टिक निकाली और जबरदस्ती सुमित्रा के होंठों पर लगाने लगी। सुमित्रा ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की। उसने हाथ जोड़ते हुए एक फीकी सी हंसी के साथ कहा, "अरे बस करो मेरी मां! मुझे और कितना रंगोगी? भगवान ने मुझे रंगने में कोई कसर कहां छोड़ी है? इस सांवले, काले रंग पर तुम्हारे ये महंगे पाउडर और क्रीम क्या जादू करेंगे? मैं जैसी हूं, वैसी ही ठीक हूं।"
सुमित्रा के इन शब्दों में छिपा हुआ दर्द रिया और स्नेहा की उम्र के हिसाब से शायद थोड़ा गहरा था, लेकिन लड़कियां समझदार थीं। रिया ने लिपस्टिक का ब्रश नीचे रखा और सुमित्रा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद संजीदगी से बोली, "चाची, आप ऐसा क्यों बोलती हैं? किसने कहा कि आपका रंग काला है या बुरा है? आप जानती हैं, हमारी क्लास में जो सबसे सुंदर लड़की है ना, उसका रंग भी बिल्कुल आपके जैसा डस्की है। और आपकी आंखें? आपकी आंखें तो इतनी गहरी और खूबसूरत हैं कि कोई भी उनमें खो जाए। मेकअप गोरे या काले रंग के लिए नहीं होता चाची, वो तो बस अपनी खुशी के लिए होता है। आप खुद को कभी कम मत आंका कीजिए।"
स्नेहा ने भी पीछे से सुमित्रा के बालों को संवारते हुए कहा, "बिल्कुल चाची! और वैसे भी, हम सब जानते हैं कि इस पूरे घर को आप कितने प्यार और सलीके से संभालती हैं। आपकी सीरत इतनी खूबसूरत है कि उसके आगे कोई भी रंग फीका पड़ जाए। आज आप हमारी बात मानिए, ये लिपस्टिक आप पर बहुत जचेगी।"
उन दोनों बच्चियों की निश्छल और प्यार भरी बातों ने सुमित्रा के दिल के किसी जमे हुए कोने को पिघला दिया था। उसकी आंखों की कोर हल्की सी नम हो गई। जिन शब्दों और जिस हौसले की उसे अपने पति या अपने मायके वालों से हमेशा दरकार रही थी, वो आज इन दो छोटी बच्चियों ने उसे दे दिया था। उसने चुपचाप खुद को उन बच्चियों के हवाले कर दिया। जब रिया ने उसका मेकअप पूरा किया, तो सुमित्रा ने एक बार फिर आईने में देखा। सच में, आज वह बहुत खूबसूरत लग रही थी। उसका आत्मविश्वास जैसे लौट आया था।
तभी बाहर से ढोल-नगाड़ों और शहनाई की आवाज आनी शुरू हो गई। "चाची, जल्दी चलिए! दूल्हा-दुल्हन आ गए हैं!" रिया और स्नेहा सुमित्रा का हाथ पकड़कर उसे हॉल की तरफ खींच ले गईं।
हॉल में रिश्तेदारों की भीड़ जमा थी। कौशल्या देवी नई दुल्हन को दरवाजे पर खड़ा करके आरती की थाली तैयार कर रही थीं। नई दुल्हन, राधिका, लाल जोड़े में सिर झुकाए खड़ी थी। सुमित्रा भी भीड़ के बीच जाकर खड़ी हो गई। उसकी नजरें राधिका पर ही टिकी थीं। मन ही मन वह दुआ कर रही थी कि राधिका का स्वभाव अच्छा हो, ताकि इस घर के भारी काम और तनाव के बीच उसे एक बहन, एक सहेली मिल सके।
कौशल्या देवी ने आरती उतारने के बाद राधिका से कहा, "चलो बहू, अंदर आओ और घर के सभी बड़ों का आशीर्वाद लो।" राधिका ने घर के अंदर कदम रखा और एक-एक करके सबके पैर छूने लगी। जब वह सुमित्रा के पास पहुंची और झुककर उसके पैर छुए, तो सुमित्रा ने उसे प्यार से उठाया और उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, "सदा सुहागन रहो, खूब खुश रहो।"
राधिका ने अपना घूंघट थोड़ा सा ऊपर किया और सुमित्रा की उन कजरारी आंखों में देखते हुए एक बेहद प्यारी सी मुस्कान के साथ कहा, "मैंने आपके बारे में बहुत सुना है दीदी। रोहन (सुमित्रा का देवर) बता रहे थे कि आप इस घर की जान हैं। और हां, उन्होंने मुझे ये भी बताया कि आप बहुत अच्छी कविताएं लिखती हैं और आपकी साहित्य में बहुत गहरी रुचि है। मैं खुद भी एम.ए. हिंदी की छात्रा रही हूं। अब हम दोनों मिलकर खूब सारी किताबें पढ़ेंगे।"
राधिका के मुंह से ये शब्द सुनकर सुमित्रा ठिठक गई। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। जिस घर में आज तक किसी ने उसकी डिग्रियों या उसकी कविताओं का जिक्र तक नहीं किया था, वहां इस नई नवेली दुल्हन ने आते ही उसके उस पुराने शौक को जिंदा कर दिया था जिसे वह खुद राख के नीचे दबा चुकी थी। सुमित्रा की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उसने राधिका को कसकर गले से लगा लिया।
उस दिन सुमित्रा को यह एहसास हुआ कि सांवला रंग या घर की चारदीवारी कभी भी किसी औरत के सपनों का अंत नहीं हो सकती। उसे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सिर्फ एक सहारे और थोड़े से आत्मविश्वास की जरूरत थी, जो आज उसे रिया, स्नेहा और राधिका के रूप में मिल गया था। सुमित्रा को लगा जैसे उसकी जिंदगी के उन स्याह और नीरस पन्नों पर आज किसी ने सुनहरे रंग बिखेर दिए हों। अब वह सिर्फ एक मंझली बहू या एक मशीन नहीं थी, बल्कि एक ऐसी स्त्री थी जो फिर से अपनी कविताओं की डायरी खोलने और अपने सपनों के आसमान में उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार थी।

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