कहानी: अंजलि

विवाह के मंडप में जब अंजलि ने सात फेरे लिए थे, तो उसकी आँखों में भविष्य को लेकर कई सुनहरे सपने तैर रहे थे। एक मध्यमवर्गीय परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की अंजलि ने हमेशा यही सोचा था कि उसका पति उसका दोस्त होगा और ससुराल उसका अपना नया घर। उसके माता-पिता ने भी अपनी सामर्थ्य से बढ़कर दान-दहेज दिया था। लड़का सुमित एक सरकारी विभाग में बड़े पद पर था, घर-बार अच्छा था, तो अंजलि के माता-पिता ने ज्यादा जांच-पड़ताल की जरूरत ही नहीं समझी। उन्हें लगा कि लड़का संस्कारी है और नौकरी अच्छी है, तो उनकी बेटी राज करेगी।
सच्चाई का कड़वा घूंट अंजलि को तब पीना पड़ा जब शादी के कुछ दिन बाद वह पहली बार 'पगफेरे' की रस्म के लिए अपने मायके वापस आई। माँ ने जब प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा कि ससुराल में सब कैसा है, तो अंजलि की आँखें छलक आईं। उसने अपने आंसुओं को पोंछते हुए बहुत ही उदास स्वर में कहा, "माँ, घर तो बड़ा है और सुमित भी कमाते अच्छा हैं, पर वहाँ मेरा कोई वजूद नहीं है। उस घर में मेरी ननद, विशाखा दीदी, अपने पति और तीन बच्चों के साथ हमेशा के लिए वहीं रहती हैं। और सिर्फ रहती ही नहीं, बल्कि उस घर की असल मालकिन वही हैं। रसोई से लेकर खर्चों तक, सब दीदी के ही इशारों पर चलता है। उनके आगे सास-ससुर भी कुछ नहीं बोलते। आप लोगों को रिश्ता पक्का करने से पहले इस बात की भनक भी कैसे नहीं लगी?"
बेटी की बात सुनकर माँ के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे अवाक रह गईं। फिर खुद को संभालते हुए बोलीं, "बेटी, जब हम लोग रिश्ता देखने गए थे, तब हमने विशाखा को वहाँ देखा था, लेकिन हमें लगा कि शादी-ब्याह का माहौल है, इसलिए वह अपने ससुराल से मायके आई होगी। हमें क्या पता था कि वह वहीं बस चुकी है। यह हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। लेकिन अब क्या हो सकता है? शादी हो चुकी है। तू समझदारी से काम लेना। बस अपने काम से काम रखना और किसी से उलझना मत। हो सकता है कुछ समय बाद तेरा पति अपना एक अलग आशियाना बना ले।"
माँ की बातों में एक झूठी तसल्ली थी, जो अंजलि को भी समझ आ रही थी। वह भारी मन से वापस अपने ससुराल आ गई। अंजलि का पति सुमित वैसे तो देखने में बहुत आकर्षक और जिम्मेदार व्यक्ति था, लेकिन उसकी सोच बहुत दकियानूसी थी। वह उन आदमियों में से था जो मानते हैं कि पत्नी का काम सिर्फ पति की सेवा करना, घर संभालना और बच्चे पैदा करना है। वह अंजलि से कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं रखता था। उसके लिए अंजलि सिर्फ एक पत्नी थी, कोई दोस्त या जीवनसंगिनी नहीं। दिन भर वह ऑफिस में रहता और शाम को आकर सिर्फ अपने मतलब की बात करता।
घर का माहौल अंजलि के लिए किसी जेल से कम नहीं था। विशाखा दीदी के तीन बच्चे—रौनक, ईशा और चिंटू—पूरे घर में तूफान मचाए रखते थे। तीनों बेहद जिद्दी, बदतमीज और बिगड़े हुए थे। उन्हें पता था कि इस घर में उनकी माँ की चलती है, इसलिए वे अंजलि को अपनी नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे।
सुबह होते ही अंजलि की भागदौड़ शुरू हो जाती। अभी वह सुमित का टिफिन बना ही रही होती कि पीछे से रौनक चिल्लाता, "मामी, मेरे लिए जल्दी से पास्ता बना दो, मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है।" अगर अंजलि कहती कि पहले वह मामा का टिफिन पैक कर दे, तो विशाखा तुरंत रसोई में आ धमकती और ताना मारती, "अरे नई बहू, मेरे बच्चे को भूखा मारेगी क्या? सुमित का क्या है, वो तो कैंटीन में भी खा लेगा, पर मेरा बच्चा स्कूल में क्या खाएगा?" सुमित भी ऐसी बातों पर अपनी बहन का ही पक्ष लेता और अंजलि को एडजस्ट करने की नसीहत दे डालता।
दिन भर अंजलि पूरे घर की सफाई करती, कपड़े धोती और रसोई में खटती रहती। विशाखा बस सोफे पर बैठकर टीवी देखती या फोन पर अपनी सहेलियों से गप्पे लड़ाती। सासु माँ उम्र के बहाने अपने कमरे में ही पड़ी रहतीं। विशाखा के पति, जो खुद कोई खास काम नहीं करते थे और ससुराल के ही टुकड़ों पर पल रहे थे, वे भी अंजलि पर हुक्म चलाने से बाज नहीं आते। "भाभी, जरा मेरे कपड़ों पर इस्त्री कर देना," या "भाभी, शाम को चाय के साथ पकौड़े बना लेना," जैसे फरमान रोज़ के ही थे।
अंजलि घुट-घुट कर जी रही थी। उसकी कला, उसकी पढ़ाई, उसकी हंसी, सब उस घर की काल कोठरी में कहीं दफन हो गई थी। एक दिन अंजलि को बहुत तेज़ बुखार आ गया। उसका शरीर तप रहा था और सिर दर्द से फटा जा रहा था। उसने सुबह उठकर सुमित से कहा कि आज उससे काम नहीं हो पाएगा, वह विशाखा दीदी से कह दे कि आज रसोई वे संभाल लें।
सुमित ने त्यौरियां चढ़ाते हुए कहा, "विशाखा दीदी को वैसे ही कमर में दर्द रहता है। तुम थोड़ा दर्द की दवा खा लो और कम से कम नाश्ता तो बना ही दो। दोपहर में आराम कर लेना।" इतना कहकर सुमित तैयार होकर ऑफिस चला गया।
अंजलि रोते हुए रसोई में गई। वह कांपते हाथों से चाय बना रही थी कि तभी विशाखा की बेटी ईशा वहाँ आई और अंजलि के हाथ से टकरा गई। खौलता हुआ पानी अंजलि के पैर पर गिर गया। वह दर्द से चीख पड़ी और वहीं जमीन पर बैठ गई। विशाखा भागती हुई आई, लेकिन अंजलि का जला हुआ पैर देखने के बजाय वह अपनी बेटी को चूमने लगी। "अरे अंधी है क्या? मेरी बच्ची जल जाती तो? काम करने का मन नहीं होता तो नाटक क्यों करती है?"
दर्द और अपमान से अंजलि के सब्र का बांध टूट गया। उसने पहली बार विशाखा की आँखों में आँखें डालकर कहा, "नाटक मैं नहीं कर रही दीदी, नाटक तो आप कर रही हैं। यह घर मेरा ससुराल है, पर आपने इसे अपनी जागीर बना रखा है। अगर आपको इतना ही राज करने का शौक था, तो आप अपने ससुराल में जाकर क्यों नहीं रहीं? मेरे माता-पिता ने मुझे यहाँ नौकरानी बनने के लिए नहीं भेजा था।"
अंजलि के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर विशाखा सन्न रह गई। उसने तुरंत रोने का नाटक शुरू कर दिया और शाम को सुमित के आते ही घर में महाभारत खड़ी कर दी। सुमित ने बिना अंजलि का पक्ष सुने, सबके सामने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई। उसने यहाँ तक कह दिया कि "अगर तुम्हें इस घर के नियमों और मेरी बहन से इतनी ही परेशानी है, तो तुम अपने मायके जाकर बैठ सकती हो।"
उस रात अंजलि अपने कमरे में बहुत रोई। लेकिन उन आंसुओं ने उसकी आँखों पर पड़ी एक बहुत बड़ी पट्टी को धो दिया था। उसने समझ लिया था कि सुमित कभी उसका नहीं हो सकता और इस घर में उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा। अगर वह अपने मायके वापस जाती है, तो समाज उसके माता-पिता को ताने मारेगा और उसकी माँ फिर से उसे 'एडजस्ट' करने की ही सलाह देगी।
अंजलि ने अपने आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ निश्चय किया। उसने अपनी अलमारी से अपनी पुरानी किताबें निकालीं। उसने बीएड कर रखा था। अगले दिन से, जब घर के बाकी लोग अपने कामों में व्यस्त होते, अंजलि अपने कमरे में बैठकर सरकारी शिक्षक की परीक्षा की तैयारी करने लगी। उसने घर के काम उतने ही किए जितने जरूरी थे, और विशाखा के बच्चों की फालतू फरमाइशें मानना बिल्कुल बंद कर दिया। विशाखा ने बहुत ताने मारे, सुमित ने भी नाराज़गी दिखाई, पर अंजलि अब किसी की नहीं सुनती थी। उसका लक्ष्य अब सिर्फ अपनी एक अलग पहचान और आर्थिक स्वतंत्रता पाना था।
महीनों की जी-तोड़ मेहनत के बाद, जब शिक्षक भर्ती का परिणाम आया, तो अंजलि का नाम चयनित सूची में था। उस दिन अंजलि ने अपना नियुक्ति पत्र सुमित के सामने मेज पर रखा। सुमित हैरान था। अंजलि ने शांत लेकिन बहुत ही सख्त लहजे में कहा, "सुमित, मैंने एक पत्नी और बहू बनने की पूरी कोशिश की, लेकिन इस घर ने मुझे सिर्फ एक मुफ्त की नौकरानी समझा। अब मैं सिर्फ अंजलि हूँ। मेरी नौकरी शहर के दूसरे छोर पर लगी है। मैं कल सुबह यहाँ से जा रही हूँ। अगर तुम मेरे साथ एक पति बनकर चलना चाहते हो, तो तुम्हारा स्वागत है। लेकिन अगर तुम अपनी बहन के आदेशों तले ही जीना चाहते हो, तो मैं तुम्हें आज़ाद करती हूँ।"
सुमित के पास अंजलि की इस बेबाकी का कोई जवाब नहीं था। विशाखा भी चुप खड़ी थी, क्योंकि उसे पता था कि अब अंजलि किसी से दबने वाली नहीं है। अगले दिन अंजलि ने अपना सूटकेस उठाया और उस घर की दहलीज पार कर ली। उसने अपनी ज़िंदगी का एक नया अध्याय शुरू किया था, जहाँ वह किसी की छाया नहीं, बल्कि खुद एक रोशन सूरज थी।

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