रसोई में दाल छौंकने की खुशबू के साथ-साथ एक अजीब सी घुटन भी फैल रही थी। सुबह के दस बज रहे थे और नेहा के हाथ मशीन की तरह चल रहे थे। एक तरफ गैस पर कुकर सीटी दे रहा था और दूसरी तरफ वह स्लैब पर खड़े होकर तेजी से रोटियां बेल रही थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। बाहर एक कुरियर वाला खड़ा था। नेहा के हाथ आटे से सने थे, इसलिए उसकी सास, विमला जी ने जाकर दरवाजा खोला। कुरियर वाले ने एक छोटा सा पैकेट थमाया जिस पर नेहा का नाम लिखा था। पैकेट देखते ही विमला जी की भौहें तन गईं। वे पैकेट लेकर सीधा रसोई में आईं और उसे स्लैब पर पटकते हुए बोलीं, "लो, आ गया महारानी का एक और सामान! पता नहीं हर हफ्ते ऐसा क्या मंगाती रहती हो। कभी कोई किताब, कभी कोई क्रीम तो कभी कपड़े। मेरे बेटे को क्या एटीएम मशीन समझ रखा है?"
नेहा ने चुपचाप गैस धीमी की और अपने हाथ धोए। उसने संयत और धीमी आवाज में कहा, "मां जी, इसमें मेरी सर्दी की एक साधारण सी शॉल है। मेरी पुरानी शॉल फट गई थी। और रही बात पैसों की, तो मेरे पति कमाते हैं, अगर मैं अपनी छोटी-मोटी जरूरतें उनसे नहीं कहूंगी तो किससे कहूंगी?"
नेहा का इतना कहना था कि विमला जी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने अपनी आवाज को और तेज करते हुए कहा, "वाह! अब बहुएं हमें सिखाएंगी कि पति की कमाई पर किसका हक है। मैंने अपनी पूरी जवानी इस घर को सींचने में निकाल दी, कभी अपने पति से एक नई साड़ी नहीं मांगी। और आजकल की लड़कियां आते ही पतियों की जेब पर डाका डालना शुरू कर देती हैं। अगर तुम्हें इतने ही शौक पालने हैं, तो अपने मायके वालों से कहो कि हर महीने तुम्हारे खर्चे के लिए पैसे भेजा करें। आखिर तुम्हारे बाप ने सरकारी नौकरी से पेंशन भी तो बांधी होगी!"
उसी समय नेहा के पति, रोहन, अपने कमरे से बाहर आए। वे ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहे थे और टाई बांधते हुए उन्होंने यह सारी बातें सुन ली थीं। रोहन ने अपनी मां को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, "मां, बस भी करो। एक शॉल ही तो मंगाई है उसने। मैंने ही कहा था मंगाने को। इसमें मायके वालों को बीच में लाने की क्या जरूरत है? आजकल की लड़कियां अपनी जरूरतें खुद बता देती हैं, इसमें गलत क्या है?"
बेटे के मुंह से बहू का पक्ष सुनकर विमला जी ने अपना असली ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। उन्होंने रोनी सूरत बनाते हुए कहा, "हां, हां, अब तो तुझे अपनी बीवी ही सही लगेगी। बेटा, ये बाहर से आई लड़कियां घर उजाड़ने और मां-बेटे को अलग करने में देर नहीं लगातीं। तू तो अभी इसके प्यार में अंधा हो रहा है। मेरी तो इस घर में कोई अहमियत ही नहीं बची।"
रोहन एकदम चुप हो गया। उसे पता था कि अगर वह एक शब्द भी और बोलेगा, तो बात इतनी बढ़ जाएगी कि उसे ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ जाएगी। वह चुपचाप अपना टिफिन लेकर घर से निकल गया। रोहन की वह चुप्पी नेहा के दिल पर हथौड़े की तरह लगी। वह जानती थी कि रोहन उससे प्यार करता है, लेकिन अपनी मां के सामने उसकी बोलती बंद हो जाती है। इस घर में नेहा की आवाज हमेशा दबा दी जाएगी, यह बात आज शीशे की तरह साफ हो चुकी थी।
शादी को चार साल बीत चुके थे। नेहा कोई मामूली लड़की नहीं थी। मायके में उसके पिता एक सम्मानित शिक्षक थे और मां एक साधारण लेकिन समझदार गृहिणी। नेहा ने शहर के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. की थी और वह अपने बैच की गोल्ड मेडलिस्ट थी। शादी से पहले उसने बी.एड. भी कर लिया था। उसके पिता हमेशा कहते थे कि उनकी बेटी एक दिन बहुत बड़ी अधिकारी या प्रिंसिपल बनेगी। लेकिन शादी के बाद ससुराल वालों ने साफ कह दिया कि उनके घर की बहुएं बाहर जाकर नौकरी नहीं करतीं। "हमें कमाने वाली नहीं, घर संभालने वाली बहू चाहिए," यह कहकर नेहा के सारे सर्टिफिकेट्स को एक सूटकेस में बंद कर दिया गया था।
नेहा ने भी घर की शांति के लिए अपने सपनों की बलि दे दी। सुबह छह बजे से लेकर रात के ग्यारह बजे तक वह सिर्फ इस घर की सेवा में लगी रहती। लेकिन आज विमला जी के उस ताने ने उसके भीतर एक सोई हुई आग को जगा दिया था। 'मायके से खर्चे के पैसे मंगाओ...' यह वाक्य उसके दिमाग में बार-बार गूंज रहा था। क्या एक औरत की अपनी कोई पहचान नहीं होती? क्या दिन-रात घर के काम करने का कोई मोल नहीं होता? अगर वह घर का काम छोड़कर बाहर काम करती, तो यही काम करने के लिए एक नौकरानी को हजारों रुपये देने पड़ते। लेकिन घर की बहू के श्रम की कोई कीमत नहीं होती। उलटा उसे अपने ही पति के पैसों पर पलने वाली बोझ समझा जाता है।
उस रात नेहा सो नहीं पाई। उसने अंधेरे में अपने सूटकेस को खोला और अपने पुराने सर्टिफिकेट्स निकाले। उसकी गोल्ड मेडल की चमक आज भी वैसी ही थी, लेकिन उसका अपना वजूद धुंधला पड़ चुका था। उसने फैसला कर लिया कि वह अब और घुट-घुट कर नहीं जिएगी। उसे किसी के एटीएम की जरूरत नहीं है। वह अपना खर्च खुद उठाएगी।
अगले दिन से जब विमला जी दोपहर में सो जातीं, तो नेहा अपने कमरे में छिपकर ऑनलाइन जॉब्स और स्कूलों में वैकेंसी खोजने लगी। उसने कई जगह अपना रेज्यूमे भेजा। एक हफ्ते बाद ही उसे एक बहुत ही प्रतिष्ठित एड-टेक कंपनी से ऑनलाइन ट्यूटर के लिए इंटरव्यू का कॉल आ गया। नेहा का विषय पर ज्ञान बहुत गहरा था, इसलिए उसने इंटरव्यू बहुत आसानी से पास कर लिया। कंपनी ने उसे वर्क-फ्रॉम-होम का विकल्प दिया, जिसमें उसे दिन में सिर्फ चार घंटे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना था और सैलरी भी बहुत अच्छी थी।
जब नेहा ने यह बात रोहन को बताई, तो पहले तो वह हिचकिचाया। "मां क्या कहेंगी नेहा? तुम्हें तो पता है उनका स्वभाव।"
नेहा ने दृढ़ता से कहा, "रोहन, मां जी को मैं संभाल लूंगी। मैं घर का कोई काम नहीं रुकने दूंगी। लेकिन अब मैं अपनी पहचान को और नहीं मार सकती। मैं भी एक इंसान हूं और मुझे भी सम्मान से जीने का हक है।" रोहन ने उसकी आंखों में वह संकल्प देखा जो उसने शादी के बाद से कभी नहीं देखा था। उसने हामी भर दी।
जब विमला जी को पता चला कि नेहा ने नौकरी शुरू कर दी है, तो उन्होंने घर में आसमान सिर पर उठा लिया। "अब यह घर को धर्मशाला बनाएगी! बाहर वालों के सामने हमारी नाक कटेगी कि हम बहू की कमाई खा रहे हैं।" उन्होंने नेहा को परेशान करने के लिए जानबूझकर घर के काम बढ़ा दिए। कभी अचानक मेहमान बुला लेतीं, तो कभी कोई नया पकवान बनाने की फरमाइश कर देतीं।
लेकिन नेहा ने हार नहीं मानी। वह सुबह चार बजे उठकर घर के सारे काम निपटा लेती। दोपहर को जब सब आराम करते, तो वह अपना लैपटॉप खोलकर पूरे आत्मविश्वास के साथ बच्चों को साइंस पढ़ाती। उसकी मेहनत और लगन देखकर रोहन भी हैरान था। उसे एहसास हो रहा था कि उसने अपनी पत्नी की काबिलियत को चार साल तक किस तरह एक रसोई में कैद करके रखा था।
महीने का आखिरी दिन था। नेहा की पहली सैलरी उसके बैंक अकाउंट में क्रेडिट हुई। यह सिर्फ कुछ हजार रुपये नहीं थे, यह उसकी आजादी, उसके स्वाभिमान और उसके वजूद की कीमत थी। वह खुशी से रो पड़ी। शाम को जब रोहन ऑफिस से आया, तो नेहा ने उसे और विमला जी को ड्राइंग रूम में बुलाया।
नेहा के हाथ में दो पैकेट थे। उसने पहला पैकेट विमला जी के हाथ में रखा। विमला जी ने झिझकते हुए उसे खोला। उसमें बनारसी सिल्क की एक बहुत ही खूबसूरत और महंगी साड़ी थी, जिसे विमला जी ने कुछ दिन पहले एक दुकान पर देखकर पसंद किया था लेकिन कीमत ज्यादा होने के कारण छोड़ दिया था।
"यह क्या है?" विमला जी ने अचरज से पूछा।
"यह मेरी पहली कमाई से आपकी मनपसंद साड़ी है, मां जी," नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर उसने रोहन की तरफ एक शानदार घड़ी बढ़ाई, जिसे खरीदने का रोहन काफी समय से सोच रहा था।
इसके बाद नेहा ने एक लिफाफा निकाला जिसमें कुछ पैसे थे। उसने वह लिफाफा सेंटर टेबल पर रखा और बहुत ही शांत लेकिन मजबूत आवाज में बोली, "मां जी, इस लिफाफे में मेरे घर के खर्च का हिस्सा है। आज के बाद आपको यह चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि मैं आपके बेटे की कमाई पर ऐश कर रही हूं या मुझे अपने शौक पूरे करने के लिए अपने मायके वालों के सामने हाथ फैलाने पड़ेंगे। मैंने कभी आपके बेटे को एटीएम नहीं समझा था, बल्कि उसे अपना जीवनसाथी माना था। लेकिन आपने मुझे एहसास दिलाया कि जब तक औरत के खुद के हाथ में पैसा न हो, इस समाज में उसकी कोई इज्जत नहीं होती।"
विमला जी सन्न रह गईं। उनके पास बोलने के लिए एक भी शब्द नहीं था। वे जिस बहू को सिर्फ एक खर्चीली और बोझ समझने की भूल कर रही थीं, उसी बहू ने आज अपने सम्मान के साथ-साथ उनके भी मान को बढ़ाया था। उन्होंने साड़ी को सीने से लगा लिया और उनकी आंखों में पछतावे के आंसू छलक आए। रोहन ने आगे बढ़कर नेहा का हाथ पकड़ लिया। उसकी आंखों में अपनी पत्नी के लिए जो गर्व था, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था।
उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। विमला जी को समझ आ गया था कि सम्मान मांगने से नहीं मिलता, बल्कि अपनी काबिलियत से कमाना पड़ता है। नेहा ने साबित कर दिया था कि एक पढ़ी-लिखी औरत अगर चाहे तो वह घर की चौखट को भी स्वर्ग बना सकती है और अपने सपनों की उड़ान से आसमान भी छू सकती है। बस जरूरत होती है तो अपने अंदर की उस आवाज को पहचानने की जो कहती है कि 'तुम किसी से कम नहीं हो।'
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