कहानी: नई शुरुआत

अंजलि जब शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल आई थी, तो उसके मन में कई तरह की आशंकाएं और डर थे। समाज में सास-ससुर और ससुराल को लेकर जो धारणाएं बनी हुई हैं, वे किसी भी नई लड़की के मन में घबराहट पैदा करने के लिए काफी होती हैं। लेकिन अंजलि के साथ जो हुआ, उसने उसके सारे डर को पहले ही हफ्ते में खत्म कर दिया। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसे अपना पुराना शहर छोड़ना पड़ा है या वह अपनी सहेलियों से दूर हो गई है, क्योंकि उसे अपने इस नए घर में इतना प्यार मिला कि वह ससुराल में बहुत अच्छे से घुलमिल गई।
अंजलि के ससुर, दीनानाथ जी, एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी थे और सास, सुमित्रा जी, एक बेहद शांत और धर्म-कर्म वाली महिला थीं। दोनों ने अंजलि को कभी बहू नहीं माना, बल्कि उसे अपनी बेटी की तरह रखा। घर का माहौल इतना खुशनुमा था कि सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, हंसी-मजाक का दौर चलता रहता। अंजलि के पति, रजत, एक बहुत ही समझदार और सुलझे हुए इंसान थे, जो अपनी पत्नी का हर कदम पर साथ देते थे। लेकिन इस भरे-पूरे परिवार में एक सदस्य ऐसा भी था, जिसकी खामोशी घर की दीवारों में कहीं गूंजती हुई महसूस होती थी। वह था रजत का छोटा भाई, अमन।
अमन एक बहुत बड़ी मल्टीनैशनल आईटी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर डेवलपर था। पिछले दो सालों से वह वर्क फ्रॉम होम के चलते घर से ही काम कर रहा था। अंजलि ने शुरुआत के कुछ दिनों में ही यह नोटिस कर लिया था कि अमन घर में होते हुए भी जैसे घर में नहीं था। उसकी दुनिया उसके कमरे, लैपटॉप की स्क्रीन और कानों में लगे हेडफोन तक ही सीमित थी। वह सुबह बस नाश्ता करने बाहर आता, वह भी चुपचाप, नजरें झुकाए। अगर कोई उससे कुछ पूछता, तो वह हां या ना में छोटा सा जवाब देकर वापस अपने कमरे में चला जाता। उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और चेहरे पर एक ऐसी थकावट थी जो शारीरिक कम, मानसिक ज्यादा लगती थी।
शुरुआत में अंजलि को लगा कि शायद अमन का स्वभाव ही ऐसा है, या फिर आईटी कंपनियों के काम का दबाव इतना ज्यादा होता है कि इंसान के पास बात करने का वक्त ही नहीं बचता। लेकिन सुमित्रा जी की आंखों में अमन को लेकर जो चिंता छलकती थी, वह अंजलि से छुपी नहीं रह सकी। एक दिन जब रजत ऑफिस गए हुए थे और सुमित्रा जी दोपहर में अंजलि के साथ सब्जी काट रही थीं, तो अंजलि से रहा नहीं गया।
"मां जी, अमन हमेशा इतना गुमसुम क्यों रहता है? मैंने उसे कभी खुलकर हंसते या आप लोगों के साथ बैठकर टीवी देखते नहीं पाया। क्या वह हमेशा से ऐसा ही है?" अंजलि ने हिचकिचाते हुए पूछा।
सुमित्रा जी के हाथ ठिठक गए। उनकी आंखों में आंसू तैरने लगे। उन्होंने सब्जी की टोकरी एक तरफ रखी और एक गहरी सांस लेते हुए बोलीं, "नहीं अंजलि, मेरा अमन ऐसा बिल्कुल नहीं था। वह तो इस घर की रौनक था। पूरे दिन पूरे घर में उसकी चहचहाहट गूंजती रहती थी। लेकिन पिछले साल उसके साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने उसे अंदर से तोड़ कर रख दिया।"
सुमित्रा जी ने बताया कि अमन का एक स्टार्टअप का सपना था। उसने अपनी नौकरी के साथ-साथ अपने एक बहुत करीबी दोस्त के साथ मिलकर एक प्रोजेक्ट पर काम किया था। उस प्रोजेक्ट में अमन ने अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी थी। लेकिन उसके दोस्त ने उसे धोखा दिया और सारे पैसे और प्रोजेक्ट का आइडिया लेकर विदेश भाग गया। उसी दौरान, जिस लड़की से अमन की सगाई होने वाली थी, उसने भी इस नाकामी को देखकर अमन से रिश्ता तोड़ लिया। एक ही झटके में अमन ने अपना पैसा, अपना दोस्त और अपना प्यार खो दिया। इस सदमे ने उसे इतना अकेला कर दिया कि उसने खुद को दुनिया से काट लिया। उसने वापस अपनी पुरानी कंपनी में वर्क फ्रॉम होम की नौकरी पकड़ ली और अब वह दिन के अठारह घंटे सिर्फ काम करता है, ताकि उसे कुछ और सोचने का वक्त ही न मिले।
यह सब सुनकर अंजलि का दिल भर आया। उसे लगा कि वह कितनी खुशकिस्मत है जो उसे इतना प्यार करने वाला पति और परिवार मिला, लेकिन उसी छत के नीचे एक इंसान अपने ही बनाए हुए खोल में घुट रहा था। अंजलि ने उसी पल तय कर लिया कि वह अमन को इस अंधेरे से बाहर निकालकर ही मानेगी। वह सिर्फ इस घर की बहू बनकर नहीं, बल्कि अमन की एक बड़ी बहन बनकर उसका हाथ थामेगी।
अगले दिन से अंजलि ने अमन के प्रति अपना रवैया बदल दिया। उसने अमन को जबरदस्ती कमरे से बाहर निकालने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसने अमन की दुनिया में ही अपनी जगह बनानी शुरू की। जब भी अमन की लेट नाइट शिफ्ट होती, अंजलि उसके कमरे के बाहर एक छोटी सी ट्रे में उसकी पसंद की अदरक वाली चाय और कुछ स्नैक्स रख आती। साथ में एक छोटा सा स्टिकी नोट होता, जिस पर लिखा होता—"काम जरूरी है, लेकिन तुम्हारी सेहत से ज्यादा नहीं। चाय ठंडी होने से पहले पी लेना - तुम्हारी भाभी।"
शुरुआत में अमन ने उन नोट्स पर कोई खास ध्यान नहीं दिया, लेकिन धीरे-धीरे अंजलि का यह निस्वार्थ अपनापन उसे छूने लगा। कभी-कभी अंजलि दोपहर के वक्त जबरदस्ती उसके कमरे में घुस जाती और कहती, "अमन, मेरा लैपटॉप थोड़ा हैंग कर रहा है, प्लीज इसे देख दो ना।" बहाने से ही सही, वह अमन को स्क्रीन से हटाकर थोड़ी देर बात करने पर मजबूर कर देती।
अंजलि कभी उसे उपदेश नहीं देती थी। उसने कभी अमन से उसके बीते हुए कल के बारे में कोई सवाल नहीं किया। वह बस एक शांत, लेकिन मजबूत उपस्थिति बनकर उसके आस-पास रहने लगी।
एक रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। रात के करीब दो बज रहे थे। अंजलि की नींद खुली तो उसने देखा कि अमन के कमरे की लाइट अभी भी जल रही है और दरवाजा हल्का सा खुला है। अंजलि उठी और धीरे से कमरे की तरफ गई। उसने देखा कि अमन अपने लैपटॉप के सामने सिर पकड़े बैठा है। उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं और वह पूरी तरह से पसीने से भीगा हुआ था। उसे पैनिक अटैक आ रहा था।
अंजलि घबरा गई, लेकिन उसने अपना संयम नहीं खोया। वह तुरंत अंदर गई, लैपटॉप की स्क्रीन बंद की और अमन के पास बैठ गई। उसने अमन के कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में लिया।
"अमन... मेरी तरफ देखो। लंबी सांस लो। कुछ नहीं हुआ है, सब ठीक है," अंजलि ने बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ आवाज में कहा।
अमन की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वह बच्चों की तरह सुबकने लगा। "भाभी... मैं नहीं कर पा रहा हूं। मुझसे कुछ भी नहीं संभल रहा है। मैं अंदर से खत्म हो चुका हूं। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं हर चीज में फेल हो गया हूं। मेरा दोस्त, मेरा प्यार, मेरा करियर... सब कुछ..."
अंजलि ने एक बड़ी बहन की तरह अमन के सिर पर हाथ फेरा। "किसने कहा तुम फेल हो गए हो? एक धोखेबाज दोस्त का चले जाना तुम्हारी नाकामी कैसे हो सकती है? एक ऐसी लड़की जो तुम्हारे बुरे वक्त में तुम्हारा साथ छोड़ गई, उसका जाना तुम्हारे लिए एक वरदान है, कोई श्राप नहीं। और करियर? तुम आज भी इतने होनहार हो कि इतनी बड़ी कंपनी में इतने अहम पद पर काम कर रहे हो। अमन, जिंदगी में ठोकर लगना इस बात का सबूत है कि तुम चल रहे हो। तुम टूट गए हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम खुद को इस कमरे में दफना लो।"
"लेकिन भाभी, मुझे डर लगता है। बाहर की दुनिया बहुत जालिम है," अमन ने सिसकते हुए कहा।
"मैं जानती हूं अमन। लेकिन तुम्हारी फैमिली, तुम्हारे भैया, मां, पापा और मैं... हम तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हें दुनिया से अकेले नहीं लड़ना है। तुम इस घर की जान हो। जब तक तुम मुस्कुराओगे नहीं, इस घर की सुबह पूरी नहीं होगी। कल जो बीत गया, उसे आज की रात इसी बारिश में बह जाने दो," अंजलि ने उसे समझाते हुए पानी का एक गिलास दिया।
उस रात अमन बहुत देर तक अंजलि के कंधे पर सिर रखकर रोता रहा। उसने अपने अंदर का सारा जहर आंसुओं के जरिए बाहर निकाल दिया। अंजलि तब तक वहां बैठी रही जब तक अमन शांत होकर सो नहीं गया।
अगली सुबह जब अंजलि और सुमित्रा जी नाश्ता बना रही थीं, तो अचानक रसोई के दरवाजे पर अमन आकर खड़ा हो गया। उसने नहाकर साफ कपड़े पहने हुए थे। उसकी दाढ़ी बनी हुई थी और आंखों के नीचे की वो भयानक उदासी आज कुछ कम लग रही थी।
"भाभी... क्या आज नाश्ते में मेरे लिए पोहा और अदरक वाली चाय मिलेगी?" अमन ने एक बहुत ही हल्की, लेकिन सच्ची मुस्कान के साथ कहा।
सुमित्रा जी के हाथ से चम्मच छूट गया। उन्होंने भागकर अपने बेटे को गले से लगा लिया और रोने लगीं। ससुर दीनानाथ जी भी अखबार छोड़कर आ गए और उनकी आंखें भी नम थीं। रजत ने मुस्कुराते हुए अंजलि की तरफ देखा। अंजलि की आंखों में भी खुशी के आंसू थे। आज उस घर में सिर्फ एक नई सुबह नहीं हुई थी, बल्कि एक बिखरा हुआ परिवार फिर से पूरी तरह से जुड़ गया था।
अंजलि ने साबित कर दिया था कि एक बहू घर में सिर्फ अपना सामान लेकर नहीं आती, वह अपने साथ ऐसा सुकून और प्यार लेकर आती है जो बेजान दीवारों में भी जान फूंक सकता है। अंजलि को अब यह घर अपना ससुराल नहीं, बल्कि अपना सबसे प्यारा मायका लगने लगा था, जहां उसने एक भाई को फिर से जीना सिखाया था।

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