सेवानिवृत्त होने से पहले क्याक्या रंगीन सपने थे यदुनंदन साहब की आंखों में. सोचते थे जीवनभर जिनजिन शौकों के लिए समय निकालने के लिए तरसते रह गए उन्हें पूरा करने का अवसर अब आ ही गया. अब वे किताबें जिन के फ्लैप पढ़ कर लोलुप होने के बाद भी जिन पर केवल सरसरी दृष्टि डाल कर अलमारी में सहेज कर रख देने के सिवा कोई चारा न था, प्यार से बाहर निकाली जाएंगी, पढ़ी जाएंगी. सर्दी की गुनगुनी धूप को बालकनी में बैठ कर चुमकारने, गले से लगाने के अवसर, जो कभीकभार रविवार या छुट्टी के दिन आते थे, अब नियमित रूप से हर दिन आएंगे.
अपने वातानुकूलित दफ्तर में बारहों महीने एक ही तापक्रम से ऊबे हुए अधेड़ शरीर को वे धीरेधीरे खुली हवा, खिली धूप की मद्धम आंच में पकते हुए वृद्धावस्था की तरफ सहज चाल से चलने देंगे. शास्त्रीय संगीत की जिन बैठकों में अपने बेहद पुराने शौक के चलते किसी तरह दौड़तेभागते तब पहुंच पाते थे जब मुख्य राग को समाप्त कर के गायक भजन या ठुमरी से समाप्ति की गुहार लगा रहे होते थे, अब उन में समय से पहुंच कर मंथर गति से रसवर्षा करते हुए आलाप को कानों में घुलते हुए महसूस कर पाएंगे.
इधर, सेवानिवृत्त हुए सप्ताह भी नहीं बीता था कि रंगीन सपनों का रंग दिन ब दिन जिंदा रहने के उपक्रम की तेज बारिश में घुल कर बहने लगा. यदुनंदन साहब को सरकारी नौकरों के बड़े पद का चस्का तो नहीं लग सका था क्योंकि वे एक प्राइवेट कंपनी में सेवा करते रहे थे पर कंपनी भी बड़ी थी और उन का पद भी. इसीलिए आर्थिक चिंताओं से मुक्त हो कर शेष जीवन बिता पाएं, इस की वे पूरी तैयारी कर चुके थे. एक अच्छी आवासीय सोसायटी में 3 बैडरूम का निजी फ्लैट, सावधानी से की हुई बचत जो शेष जीवनभर के लिए पर्याप्त थी और जैसा कि आम हो गया है, अमेरिका में सैटल हुए एक बेटा और एक बेटी. इन सब के रहते हुए भी वे रोज किसी न किसी समस्या से जूझते हुए सारा का सारा दिन बिताएंगे, इस दुस्वप्न ने उन के रंगीन सपनों में कभी हस्तक्षेप नहीं किया था.
नौकरी के अंतिम 10 वर्षों में तो किसी भी सरकारी, गैरसरकारी विभाग में अपना निजी काम भी कराने के लिए अपने निजी सहायक पर वे सारी जिम्मेदारी छोड़ देते थे और पूछना तक नहीं पड़ता था कि भागदौड़ कंपनी के किस कर्मचारी से करवाई गई.
अब गैस की बुकिंग से ले कर बिजली आपूर्ति की शिकायतें करतेकरते ही दिन फुर्र हो जाया करेगा, यह किस ने सोचा था. इसीलिए रिटायर हो कर निजी फ्लैट में शिफ्ट करने के बाद जब ड्राइविंग लाइसैंस और कार के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट यानी आरसी में अपने नए पते को दर्ज कराने की जरूरत आ पड़ी तो उन के अनुभवी दिमाग ने यह बात उन के मन को पहले ही समझा दी कि आज का दिन तो बरबाद हुआ. सेवानिवृत्ति के मुंडन के बाद रोज की घरेलू दिक्कतों के ओले जब सिर पर गिरना शुरू हो चुके हैं तो इतनी चोट सहने के लिए स्वयं को तैयार करना ही पड़ेगा, सोच कर उन्होंने कमर कस ही ली.
आरटीओ कार्यालय जाने की तैयारी में उन्होंने अपनी कार की आरसी, ड्राइविंग लाइसैंस और पते के पुष्टीकरण के लिए अपना पासपोर्ट, तीनों की मूलप्रतियां अपने कीमती ब्रीफकेस में संभाल कर रखीं और उसे कार में आगे बाईं सीट पर अपनी बगल में रख दिया. पत्नी को बता दिया कि लंच के समय तक घर आ जाएंगे. फिर बालकनी में खड़े हो कर हाथ हिलाती पत्नी से कार से हाथ निकाल कर मुसकरा कर विदा ली और कार को आरटीओ औफिस जाने वाले रास्ते पर दौड़ा दिया. लगभग 15 मिनट के बाद एक बहुत व्यस्त टै्रफिक सिग्नल पर, जहां 120 सैकंड का इंतजार था, उन्होंने ईंधन बचाने के लिए इंजन बंद किया और सामने के दोनों शीशे नीचे कर लिए. तभी बाईं खिड़की में झांक कर एक भिखारीनुमा छोकरे ने कहा, ‘‘साहब, आप का पिछला चक्का तो घूमता है.’’
यदुनंदन साहब पीछे का टायर जांचने के लिए गाड़ी से नीचे उतरे. पर टायर को सही सलामत पा कर उस छोकरे की शैतानी पर उसे कोसते हुए जब वापस ड्राइवर सीट पर बैठे तो अचानक देखा कि साथ की सीट पर रखा हुआ ब्रीफकेस गायब था. इस के बाद उस छोकरे को मन ही मन गालियां देने के बाद अपनी असावधानी पर खुद को कोसते हुए जब वे आरटीओ औफिस में पहुंचे तो चिंताओं से ग्रस्त थे. ब्रीफकेस में रखे उन तीनों महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों के बिना वे काम कैसे होंगे जिन के लिए वे घर से चले थे. पासपोर्ट का खोना अपनेआप में एक मुसीबत थी. अब तो आरटीओ औफिस में डुप्लीकेट आरसी और ड्राइविंग लाइसैंस बनवाना मुख्य काम हो गया था और इन दोनों में नया पता दर्ज कराना बाद की बात हो गई थी. खैरियत थी कि डीएल और पासपोर्ट की फोटोप्रतियां अलग रखी थीं.
कार से उतरते ही उन्हें दलालों ने घेर लिया. यदुनंदन साहब ने उन से अपनी समस्या बताई तो 3 अलगअलग व्यक्तियों में से एक ने ड्राइविंग लाइसैंस का डुप्लीकेट बनवाने में, दूसरे ने कार की डुप्लीकेट आरसी बनवाने में और तीसरे ने इन दोनों कागजों पर नया पता दर्ज करवाने में अपनी महारत का बखान कर दिया. यदुनंदन साहब ने कहा, ‘‘भाई, तीनों काम एक ही आदमी से क्यों न करवाऊं. आजकल तो ‘टर्न की कौंट्रैक्ट’ का जमाना है.’’
जवाब में एक बोला, ‘‘साहब, आजकल स्पैशलिस्ट होने का जमाना है. आप ने कभी डैंटिस्ट से अपनी आंखें चैक कराई हैं क्या?’’
दूसरे ने समझाया, ‘‘सर, हर काम के लिए अलग खिड़की है, हर खिड़की पर अलग बाबू है, हम सारे के सारे बाबुओं से कहां तक सैटिंग कर सकते हैं?’’
तीसरा, जो पता नहीं मजाकिया स्वभाव का था या बड़ा कलाकार, बोला, ‘‘और सर, ‘टर्न की कौंट्रैक्ट’ शब्द यहां सोचसमझ कर बोलिएगा. यहां इस का मतलब है कि नकली चाबी या ‘मास्टर की’ के इस्तेमाल से चोरी की हुई कार के पेपर बनवाने हैं. वह काम भी हो जाएगा पर आप के हुलिए को देख कर इस का ठेका कोई आप से नहीं लेगा, करवाना हो तो मुझी को याद करिएगा.’’
यदुनंदन साहब विशेष हंसीमजाक के मूड में नहीं थे. ब्रीफकेस की चोरी के बाद हो भी नहीं सकते थे. झल्लाते हुए बोले, ‘‘अच्छा, चलो, तीनों अलगअलग ही अपनेअपने काम संभालो, पर पैसे कितने लगेंगे?’’ पूछने को तो वे पूछ बैठे पर उत्तर सुन कर घबरा गए. तीनों दलालों ने अपनेअपने काम के हजारहजार रुपए बताए और कहा कि
4 एफिडेविट्स यानी शपथपत्र बनवाने के प्रति एफिडेविट 400 रुपए यानी 1600 रुपए अलग से लगेंगे. इस के अलावा सरकारी फीस, अर्थात वह धनराशि जिस की रसीद मिलेगी, उसे अलग से जमा करवाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होगी.
यदुनंदन साहब को आशा थी कि मोलभाव कर के वे कुछ रुपए कम करा लेंगे पर दलालों ने उन्हें घास नहीं डाली, बल्कि उन का मजाक उड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘साहब, ऐसा है कि इन में से कोई एक काम आप खुद कर के देख लो, फिर समझ में आ जाएगा कि हम अपनी मेहनत के कितने कम पैसे मांग रहे हैं. हो सकता है कि तब आप शरमा कर हमें बाकी के दोनों काम के ही उतने पैसे दे दें जितने हम तीनों काम के मांग रहे हैं.’’
यदुनंदन साहब को उन की बात कुछ तो समझ में आई क्योंकि चारों तरफ बावली सी भटकती भीड़ और हर खिड़की के आगे लगे जमघट ने ऐसा माहौल बना रखा था कि उन्हें परेशानी लग रही थी. इसलिए इन खुदाई खिदमतगारों की बात पर विश्वास करने का सहज में ही मन कर रहा था.
लेकिन 400-400 रुपयों के 4 एफिडेविट्स वाली बात गले से नीचे नहीं उतरी. पूछा, ‘‘ये 4-4 एफिडेविट्स की क्या जरूरत है? एक में ही क्यों न लिखवा लूं कि मेरा ड्राइविंग लाइसैंस और आरसी गुम हो गए हैं जिन में मेरा पता पुराना लिखा हुआ था. अब नया बना कर दे दिया जाए जिन में मेरा नया पता यह होगा?’’
दलालों में से एक ने उन्हें नीचे से ऊपर तक देखा और बड़ी सहानुभूति से बोला, ‘‘लो जी, समझ में आ गया कि आप किसी सरकारी दफ्तर में पहली बार आए हो.’’
दूसरे ने समझाते हुए कहा, ‘‘सरजी, डुप्लीकेट आरसी एक खिड़की पर बनेगी, पता बदलने का काम दूसरी पर होगा. यही बात डीएल पर भी लागू होती है. अब आप का एक एफिडेविट ले कर एक बाबू दूसरे बाबू के यहां उठउठ कर भागेगा तो उस की खिड़की पर काम कौन करेगा? पब्लिक खाली खिड़की देख कर हल्ला मचाएगी कि नहीं?’’
तीसरा दलाल कुछ ज्यादा ही मुंहफट निकला. बोला, ‘‘सरजी, आप को ट्रिपल संडे आइसक्रीम या तिरंगी बर्फी खाने का शौक होगा पर वह शौक यहां पूरा न होगा. यहां हर खिड़की पर अलग मिठाई मिलती है. यहां काम कराना हो तो चुपचाप फाइल में इतने पेपर डालो या फिर उस के ऊपर इतना वजन डालो जितना बताया जाए. इतनी बातें पूछोगे तो आप के सवालों के जवाब यहां मिलने से रहे.’’
ट्रिपल संडे आइसक्रीम की तरह ही यदुनंदन साहब के ऊपर प्रतिक्रियाएं भी 3 तरह की हुईं. पहले तो इन बेचारों की नासमझी या अल्पबुद्धि पर तरस आया, फिर इस औफिस की व्यवस्था पर गुस्सा आया और अंत में उन के व्यंग्य से आहत हो कर अपमानित सा महसूस किया उन्होंने. पर कुल मिला कर उन की बातें उन्हें एक तरह की चुनौती सी लगीं जिन्हें उन का आत्मसम्मान चुपचाप झेल जाने के लिए तैयार नहीं था. सोचा, ‘अब कौन सी अपने औफिस पहुंचने की जल्दी है. पत्नी को फोन कर दूंगा कि लौटने में देर होगी और सारा काम निबटा कर ही वापस जाऊंगा.’
बात सिर्फ रुपयों की नहीं थी, कुछ कर के दिखाना है, वाली हो गई थी. यदुनंदन साहब ने चुनौती स्वीकार करते हुए उन तीनों से कहा, ‘‘चलो, आज यही सही.’’ और उस तरफ बढ़ चले जिधर एक बड़े से बोर्ड पर साफसाफ बड़े अक्षरों में बहुत सरल और सहज तरीके से विभिन्न दस्तावेजों के जारी कराने या उन की डुप्लीकेट प्रति के पाने के लिए क्या करना होगा, बताया गया था.
विभिन्न आवेदनों के लिए जमा करने की फीस अलग से दी हुई थी. पढ़ कर उन्हें लगा कि इन कामों के लिए 40, 50 या 60 रुपए की फीस कोई अनुचित या अधिक रकम नहीं थी. फिर किस खिड़की पर कौन सा काम होगा और कौन से आवेदन का फौर्म नंबर क्या था, ये भी बहुत स्पष्ट लिखा हुआ था. इतनी सुव्यवस्थित ढंग से सारी जानकारियां दी हुई थीं कि उन्हें अपनी कमजोरी और मूर्खता पर शर्म आई कि इतने पढ़ेलिखे होने के बावजूद उन्होंने दलालों के चक्कर में पड़ने की सोची. उन्होंने मन ही मन कसम खाई कि आगे से एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सब काम करेंगे. एक बोझ सर से हट गया हो ऐसा महसूस करते हुए, हलके मन से वे फौर्म बेचने वाली खिड़की के सामने वाली लाइन में जा कर लग गए.
उन का नंबर आने से पहले उन्हें एक उलझन ने घेर लिया. उन्हें खोई हुई आरसी के बदले में एक डुप्लीकेट आरसी लेनी थी फिर उस में अपना नया पता दर्ज कराना था. यही कहानी ड्राइविंग लाइसैंस के लिए भी दोहरानी थी. पर डुप्लीकेट आरसी के लिए एक फौर्म था, आरसी में पता बदलने के लिए दूसरा फौर्म था. इन 4 टुकड़ों में बंटे हुए हर काम के लिए अलगअलग खिड़कियां थीं. उन्हें लगा कि अगर डुप्लीकेट आरसी के आवेदन में ही नया पता भी लिख कर दे दें तो दोनों काम एकसाथ हो जाएंगे, ज्यादा से ज्यादा यही तो होगा कि दोनों फौर्म भर कर एकसाथ नत्थी करने होंगे. यही तरीका ड्राइविंग लाइसैंस के लिए भी अपनाया जा सकता था. पर सवाल था कि फौर्म जमा कहां करेंगे. डुप्लीकेट जारी करने वाली खिड़की पर या पता बदलने वाली खिड़की पर. अभी वे यह सोच ही रहे थे कि उन्होंने अपनेआप को फौर्म बेचने वाली महिला के सामने पाया. उन के प्रश्नों के उत्तर में उस ने कहा कि उस का काम फौर्म बेचने का था और फौर्म तो उन्हें चारों भरने ही पड़ेंगे. अब वे 4 की जगह किन 2 खिड़कियों पर जाएं, उसे नहीं मालूम. इस के लिए वे पूछताछ वाली खिड़की पर जाएं.
यदुनंदन साहब ने चारों फौर्म लिए, उन्हें भरा और पूछताछ की खिड़की पर जा कर अपना सवाल दाग दिया. वहां बैठे बाबू को उन का सवाल बहुत बचकाना लगा. बोला, ‘‘जब डुप्लीकेट आरसी बन जाएगी तभी तो उस में पता बदल कर लिखा जाएगा.’’
यदुनंदन साहब ने कहा, ‘‘पर नए पते के साथ ही डुप्लीकेट आरसी क्यों नहीं बन सकती?’’
बाबू ने कहा, ‘‘फिर फौर्म आप जमा कहां कराएंगे?’’
वे बोले, ‘‘डुप्लीकेट आरसी देने वाली खिड़की पर, और कहां?’’
बाबू ने प्रतिप्रश्न दागा, ‘‘डुप्लीकेट देने वाला बाबू पता बदलने वाला आवेदन फौर्म आप से लेगा ही क्यों?’’
यदुनंदन साहब चिढ़ कर बोले, ‘‘अरे, यही तो मैं पूछ रहा हूं, क्यों नहीं लेगा?’’
बाबू और जोर से झल्ला कर बोला, ‘‘जब उस का काम डुप्लीकेट आरसी बनाने का है तो वह पता बदलने का काम क्यों करेगा? आप का बस चले
तो आप एकएक आदमी पर दसदस आदमियों का बोझ लदवा दें. आप उस गरीब, निसंतान अंधे की कहानी सुन कर तो नहीं आ रहे हैं जिस ने प्रकृति से यह मांगा था कि अपनी गोद में अपने बेटे को बैठा कर सोने की कटोरी में खीर खाते हुए देख सके?’’
यदुनंदन साहब इस बेजा बात का कोई तगड़ा सा उत्तर अपने मन में टटोल ही रहे थे कि लाइन में उन के पीछे खड़े लोग अधीर हो कर हल्ला मचाने लगे कि उन्हें बहस करने का इतना शौक है तो पहले दूसरे लोगों को फौर्म खरीद लेने दें, फिर फुरसत से बहस करें. लाइन लंबी थी. एक बार चूके तो फिर 20 मिनट लग जाएंगे. इसलिए पीछे शोर मचाने वालों की अनदेखी करते हुए उन्होंने पूछ ही डाला, ‘‘अच्छा, एक ही एफिडेविट में लिखवा दूं कि आरसी और डीएल दोनों खो गए हैं और दोनों में दिया गया पता अब बदल कर यह ही हो गया है तो चलेगा?’’
बाबू अब तक जल्दीजल्दी उत्तर दे रहा था. अब उस ने सामने रखा अखबार बंद किया, अंदर अपने पीछे खड़े 2 दलालों को पीछे हटने का संकेत दिया और बड़ी हिकारत से बोला, ‘‘आप, सिर्फ इस औफिस में काम करने वाले लोगों में से आधे की नौकरी खत्म कराने आए हो या साथ में बेचारे वकीलों और नोटरी वालों के भी पेट पर लात मारने का मन बना कर आए हो?’’
बात बिगड़ती देख कर और इस बातचीत को लंबी बहस में बदलते देख कर लाइन में पीछे खड़े लोग अब एकसाथ यदुनंदन साहब के ऊपर बरस पड़े. पीछे खड़े एक बुजुर्ग ने मुंह बना कर कहा, ‘‘साहब, आप हाईकोर्ट में जा कर वकालत करिए, यहां क्यों सब को परेशान कर रहे हैं?’’
यदुनंदन साहब ने चुपचाप चारों एफिडेविट बनवाने में ही खैरियत समझी और लाइन से बाहर आ गए.
उन के जातेजाते भी अंदर से बाबू ने आगे सलाह दी, ‘‘और हां, एफिडेविट आप विजयपाल साहब, जो गेट के
बाईं ओर बैठते हैं, से बनवाना, वरना गलतसलत बन जाएगा.’’
यदुनंदन साहब इतनी सी देर में इतने समझदार हो चुके थे कि बाबू का इशारा समझ जाएं. खत्री साहब पब्लिक नोटरी के पास जाने से पहले उन्होंने चारों फौर्म खरीदे और बुझे मन से गेट की तरफ चल दिए.
गेट से बाहर आ कर बाएं मुड़े तो कई सारी गुमटीनुमा दुकानों में बहुत से वकीलों के बोर्ड लगे दिखे, पब्लिक नोटरी भी कई थे पर आर एन खत्री, पब्लिक नोटरी के बोर्ड वाली गुमटी के सामने ज्यादा भीड़ थी.
यदुनंदन साहब वहां पहुंचे तो सामने कंप्यूटर पर बैठे व्यक्ति ने पूछा, ‘‘हां जी, सरजी, बोलो, क्या बनवाना है?’’ यदुनंदन साहब ने बताया कि उन्हें
4 एफिडेविट्स बनवाने हैं, 2 कागजात खोने के और 2 पुराना पता बदल कर नया पता बताने के.
वह बोला, ‘‘देखो सरजी, एस तरा है कि 4 एफिडेविट्स के 1600 रुपए लगेंगे. लेकिन अगर एक ही से काम चलाना हो तो सिर्फ 1 हजार लगेंगे.’’
यदुनंदन साहब एक मिनट तो अवाक् रह गए फिर खांस कर गला साफ कर के बोले, ‘‘भाई, एक एफिडेविट तो 400 रुपए का बताया है न आप ने, फिर
1 हजार किस बात के?’’
उस ने उकता कर जवाब दिया, ‘‘साब जी, आप को आम खाना है तो खाओ, पेड़ क्यों गिनते हो. अब पूछोगे एफिडेविट देने की क्या जरूरत है, सादे कागज पर ही क्यों न लिख कर दे दूं कि मेरे कागज गुम गए हैं और मेरा पता बदल गया है.’’
यदुनंदन साहब तय नहीं कर पा रहे थे कि अपने मन की बात मन में ही रहने दें या उसे बता डालें. फिर कहने भर का साहस जुटा ही लिया उन्होंने. बोले, ‘‘सोच तो रहा था मैं भी यही, पर कह नहीं पा रहा था. अगर मेरी कोई बात लिख कर देने से भी विश्वास के योग्य नहीं है तो स्टांप पेपर पर लिख कर देने से कैसे उस पर विश्वास कर लिया जाएगा? और अगर मैं कोई झूठा बयान सादे कागज पर लिख कर दे दूं तो क्या सरकार उस पर कोई कार्यवाही कर ही नहीं सकती है?’’
वह चकित था. बोला, ‘‘केस कैसे करेगी जी? स्टांप पेपर नहीं होगा तो कैसे कार्यवाही करेगी?’’
यदुनंदन साहब बोले, ‘‘अच्छा, अगर मैं सादे कागज पर आप को चिट्ठी लिखूं कि मुझे शाम तक एक लाख रुपए दो नहीं तो तुम्हारा मर्डर कर दूंगा तो क्या स्टांप पेपर पर न होने के कारण पुलिस उस पर कोई कदम नहीं उठाएगी?’’
वह सकपका गया. बोला, ‘‘लो जी, आप तो हमारी रोजीरोटी ही नहीं, सरकार की रोटी भी छीनने पर लग गए हो. स्टांप पेपर नहीं बिकेंगे तो सरकार कैसे चलेगी?’’ इस के पहले कि यदुनंदन साहब उसे समझाना शुरू करते कि सरकार बिना स्टांप पेपर पर एफिडेविट बनवाए कैसे चलाई जा सकती है, उस ने घुटने टेक दिए. बोला, ‘‘सरजी, आप के इतने सवालों का जवाब मैं क्या दूं. बस, अपने काम की बात सुन लो. सिर्फ एक एफिडेविट से काम चलाना है तो 400 रुपए एफिडेविट के, 400 रुपए चारों बाबुओं के और 200 मेरी चारों बाबुओं से सैटिंग के, कुल मिला कर हजार बने. अब बोलो, हजार वाला काम कराना है या 1600 वाला?’’
यदुनंदन साहब के पास आराम से पेट भरने के लिए तो रुपए थे पर फेंकने के लिए नहीं. इसलिए उन्होंने प्लेन वनीला की 4 आइसक्रीमों पर हजार रुपए की ट्रिपल संडे आसक्रीम को तरजीह दी और एक ही एफीडेविट बनवाया.
ताज्जुब तब हुआ जब कंप्यूटर से एफिडेविट का प्रिंटआउट निकालने के बाद उस आदमी ने कागज पर नोटरी विजयपाल की बड़ी सी गोल रबर स्टैंप लगा कर कहा, ‘‘आप 2 मिनट रुको, मैं वकील साहब से अभी दस्तखत करा कर लाता हूं.’’
यदुनंदन साहब ने कहा, ‘‘पर मेरी दस्तखत तो अभी कराई नहीं.’’
उस ने कहा, ‘‘जी, सब आप की तरह खुद थोड़ी आते हैं, हम तो एफिडेविट नोटराइज करा कर दे देते हैं कि लो जी, अब फुरसत से जिस को घुग्घी मारनी है मारो. यदुनंदन साहब ने हैरानी से पूछा, ‘‘फिर उन की दस्तखत का क्या माने होगा?’’
वह समझाते हुए बोला, ‘‘सरजी, उस का माने होगा कि वे आप को जानते
हैं, पुष्टि करते हैं कि आप ही मिस्टर यदुनंदन वल्द रामकुमार हो. और सत्यापित करते हैं कि इस कागज पर आप के ही दस्तखत हैं?’’
यदुनंदन साहब के अचरज का ठिकाना नहीं था. बोल पड़े, ‘‘पर वे तो मुझ को जानते नहीं हैं. दस्तखत भी मैं उन के सामने नहीं कर रहा हूं. फिर वे सत्यापन और पुष्टि या जोजो आप कह रहे हो, कैसे करेंगे?’’
विजयपाल साहब को अचानक पता नहीं क्या हुआ, साष्टांग दंडवत की मुद्रा में आ गया और लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘मालिक, मैं गरीब किरानी हूं. ज्यादा नहीं दे सकता. पर सौपचास रुपए ले कर सचसच बता दो, आप कौन से लोक से इस धरती पर पधारे हो?’’

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