विहान होने को था. मैं ने खिड़की से बाहर झांका, कालिमा से ढकी शहर की इमारतें उभरने लगी थीं. पंछियों की चहचहाहट भोर का संदेश पढ़ रही थी, तभी फोन भी उन के साथ संगीत देने लगा. बिस्तर छोड़ कर फोन उठाया. मां का फोन था. बिना किसी खास प्रयोजन के मां ने कभी इतनी सुबह फोन नहीं किया. कुछ बात जरूर है, मन में अंदेशा हुआ. तब सुबह के 6 बज रहे थे.
‘‘जय गुरुदेव मां, सब ठीक है न?’’ मैं ने पूछा.
‘‘जय गुरुदेव. यहां सब ठीक है, निधि कैसी है?’’
‘‘अच्छी है, आजकल उसे पेंटिंग बनाने का शौक लगा है.’’
‘‘यह तो अच्छी बात है. अब एक बात ध्यान से सुनो, बेटा. तुम्हें 2 लाख रुपयों की व्यवस्था करनी है. इसे गुरु महाराज का आदेश ही समझना,’’ मां सीधे काम की बात पर आ गईं.
मुझे काटो तो खून नहीं. कैसे अपनी विवशता बताऊं. एक उलझन पहेली बन कर मुझ से प्रश्न करने लगी.
‘‘मां, इस वक्त मैं ऐसी स्थिति में नहीं कि रुपए भेज सकूं,’’ मैं ने कहा.
‘‘इतने साल हो गए नौकरी लगे. कहां जा रहा है पैसा? बीवी के पल्लू से बंधा रहेगा तो कंगाल ही रहेगा,’’ मां अपना लहजा जरा सख्त करते हुए बोलीं.
मां द्वारा बारबार पैसों की मांग. बारबार मकान बदलना. औफिस जानेआने का खर्च और ऊपर से गृहस्थी चलाना. किस तरह बचत होगी, मैं ने सोचा.
मां कहती चली गईं, ‘‘तेरे बाद ही कन्नू का जौब लगा है. वह 3 लाख रुपए आश्रम को दे रहा है.’’
सुबहसुबह सारा मूड खराब हो गया. मां से बहस करना व्यर्थ था. मैं चुप रह गया.
‘‘दीक्षा तू ने भी ली, कन्नू ने भी. वह भक्ति मार्ग में कितना आगे बढ़ गया, तू जहां का तहां रह गया. बीवी ने तुझे कहीं का नहीं छोड़ा. अरे मूर्ख, आश्रम में गुरु महाराज एक बड़ा हौल बनवा रहे हैं, कुछ कमरे भी बनेंगे. जब कभी गंगा स्नान को जाएंगे तो वहां जब तक चाहें निशुल्क रह सकेंगे.’’
‘‘वह तो ठीक है लेकिन अभी 2 लाख रुपए कहां से लाऊं? मैं फ्लैट खरीदने की सोच रहा था, मां,’’ अंतर्मन पीड़ा से आहत हो गया.
‘‘अभी कौन सी उम्र जा रही है, ले लेना बाद में. कन्नू से कुछ सीख. गुरु महाराज की एक बार कृपा चली गई तो फिर कुछ हासिल नहीं होगा,’’ मां ने गुस्से में फोन पटक दिया.
मैं झुंझलाहट और खीझ से भर उठा. हर चीज से बैर होने लगा. जिंदगी एकाएक मुश्किलों का पहाड़ बन गई. इस उम्र तक भी मेरे निर्णय अपने नहीं थे. मांबाप के हाथों की कठपुतली बने नाच रहे थे हम सब. इन हालात की उत्पत्ति में मूल कारण मातापिता ही थे जो हमें सहीगलत का फर्क नहीं सिखा पाए. हम तीनों भाईबहन कैसे बड़े हुए, पता नहीं चला.
पिताजी सरकारी नौकरी में थे. मां पुराने खयालों की थीं, साथ ही तेजतर्रार और तीखे स्वभाव की. वहीं पिता का शांत स्वभाव. विडंबना थी कि हर फैसले मां के ही अनुरूप होते. चाहे गलत ही हों, कभी विरोध नहीं हुआ. 3 भाईबहनों में मैं सब से बड़ा था. सब से छोटी बहन थी. मां की बातों से असहमत हो कर भी पिताजी खामोश रह जाते और मां की हर बात पत्थर की लकीर बन जाती.
मां अथाह अंधश्रद्धा के रास्ते पर चल दीं. पिता भी उसी राह पर घिसटने को मजबूर हो गए. संतअसंत के भेद को समझ नहीं पाए. समयकुसमय सत्संगों में जाने लगे. धीरेधीरे क्रम बढ़ता ही चला गया.
तब मेरी उम्र ऐसी न थी कि परिस्थितियों का विवेचन कर पाता. पढ़नेखेलने की उम्र थी. स्कूल से आते तो घर सूना नजर आता. पिता या तो औफिस में होते या मां के साथ किसी संतसमागम में. हम कई बार भूखे रह जाते. छोटी बहन भूख से बिलबिला उठती. हम घर का कोनाकोना छान मारते. जो कुछ हाथ लगता, मैं पका लेता.
कई बार आग से हाथ जल जाते. हमारा किसी से कोई सरोकार न था. रिश्तेदार बिना खास प्रयोजन के फोन तक नहीं करते थे. एक गुमनाम सी जिंदगी बिता रहे थे. मांबाप को इसी में जिंदगी का सच दिखता. हम कच्ची उम्र में यथार्थ के आईने से दूर थे. कुछ दिखाई नहीं दिया. अब यह एहसास रहरह कर मन में कौंधता है और धूधू कर जलने को विवश कर देता है. पिताजी की कमाई सामान्य थी. इतनी नहीं थी कि हर आवश्यकता की पूर्ति हो. किराए के घर में अभावों का डेरा था. तंगहाली में जिंदगी जीने के आदी हो गए थे हम लोग.
मां वेतन का हिसाबकिताब रखतीं और जमापूंजी आश्रमों में भेंट कर देतीं. सोच और दिशा जब काबू में नहीं रह जाते तब इंसान सही रास्ते का चुनाव करने से चूक जाता है.
समय बीत रहा था. मातापिता का विरक्ति की ओर रुझान था. यथार्थ से कहीं दूर, एक डोर थी जो हमें खुदबखुद खींचती जा रही थी. पढ़ने में सभी औसत से ऊपर थे, आगे बढ़ते रहे. छोटी बहन को लाड़प्यार ने जिद्दी बना दिया. उस की महत्त्वाकांक्षाओं ने सीमाएं लांघ दीं. एमबीए करने के बाद भी घर में रह गई. छोटामोटा जौब नहीं करना चाहती थी. शादी की बात उठती तो वह होने वाले हर रिश्ते में मीनमेख निकालने लगती. रिश्ता भी ऊंचे दरजे का चाहिए था. उम्र खिसक रही थी. न मां को, न पिताजी को ही चिंता होती.
दोनों आश्रमों के चक्करों में लट्टू बने रहे. हमें भी गुरु महाराज से दीक्षा दिलवाई गई. चमत्कार और कल्याण की अपेक्षा में दोनों भरेपूरे परिवार को छोड़ इधरउधर दौड़ते रहे.
नतीजतन, आज तक बहन के हाथ पीले न हो सके. इस का मलाल उन्हें तब भी नहीं था, आज भी नहीं है. आज भी बहन एक जौब करती है, दूसरा पकड़ लेती है.
ऐसे माहौल में हम ने किस तरह पढ़ाई पूरी की, कैसे जौब मिला, इस की अलग दास्तान है. जीवन में उतारचढ़ाव, सफलताअसफलता मेहनत और पुरुषार्थ पर निर्भर है. कभी इच्छाएं थोड़े परिश्रम से पूरी हो जाती हैं, कभी कठिनाई से लेकिन इस तरह नहीं जैसे हमारा परिवार चाहता था.
मेरे औफिस के सभी सहकर्मियों के पास अपना घर है, गाड़ी है. एक खुशहाल जिंदगी है. मेरे पास किराए का फ्लैट है और थोड़ाबहुत सामान. हमारा रुपयापैसा सत्संगों, समागमों की भेंट चढ़ रहा था. पूरा परिवार किसी अज्ञात अग्निपथ पर बढ़ा जा रहा था.
जब विवाह हुआ तब पत्नी के गुणों को समझने लायक न था. उस की सच्ची बातें व्यर्थ लगतीं. जब उम्र ने समझाया, लोगों का उत्थान देखा तब हकीकत की जमीन दिखाई दी.
आंखों के आगे घुप अंधेरा सा छा गया. जब अंधेरा छंटा तो काफी समय बीत गया. तनाव बादल की शक्ल में अभी तक दिलोदिमाग में तैरे ही जा रहे थे.
कुछ दूर बैठी रश्मि खिड़की पर लगे परदे के फटे हिस्से को तल्लीनता से सी रही थी. उस के चेहरे में एक गंभीरता थी जो वह पढ़ रहा था.
ससुराल में रश्मि के पैर पड़े. उस ने घर की जीर्णशीर्ण व्यवस्था बदलनी चाही किंतु आजादी न मिली. उसे विरोधी और धर्माचरण विपरीत कहा गया. अब वह इसी परिवेश में खो गई है. विवाह के चंद महीनों तक जो कांति और चुलबुलाहट थी उसे निराशा के शृंगार ने ढक लिया था. मातापिता अकसर छोटे भाई के पास ही रहते. हमारे साथ होते तो विचारों में एकरूपता नहीं रहती. कन्नू पर उन का प्यार हर वक्त बरसता रहता क्योंकि कन्नू और उस की पत्नी रिचा मां के हर आदेश पर एकसाथ खड़े हो जाते.
रश्मि सुशील और व्यावहारिक थी किंतु उन्हें पसंद न थी. रश्मि के मन में आदरसम्मान था और वे उपेक्षा करते.
इसी सप्ताह मैं ने फ्लैट खरीदने का फैसला किया तो रश्मि की आंखों में हसीन सपने तैरने लगे. इधर मैं 35 लाख रुपए जुटाने की जुगत में लग गया. बैंक से कर्ज उठाने के लिए दौड़धूप करने लगा. इतने सालों में कुल 4 लाख रुपए बैंक में जमा हो पाए थे. रिश्तेदारों से कहना मूर्खता थी. रश्मि के पिता ने भी खुशी से सहायता करने की हामी भर दी. अब मां के आदेश ने अरमानों के हसीन घर की चूलें हिला कर रख दीं.
‘‘रश्मि, इधर आओ तो जरा. तुम से राय लेनी है.’’
‘‘आती हूं. बस, 2 मिनट,’’ रश्मि परदे को यथावत लटकाते हुए बोली.
थोड़ी देर बाद वह आई, ‘‘बताओ, क्या बात है?’’
‘‘मां का फोन आया था अभीअभी.
2 लाख रुपए मांग रही थीं गुरु महाराज के आश्रम में भवन निर्माण के लिए,’’ मैं ने रश्मि की राय लेनी चाही.
‘‘कब विवेक जागेगा इन का. क्यों इन बाबाओं के पीछे बरबाद होने पर तुले हैं. आप ने यह नहीं बताया कि हम फ्लैट बुक कर रहे हैं.’’
‘‘बताया था, लेकिन सुनें तब न. तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं? कन्नू तो 3 लाख रुपए दे रहा है.’’
‘‘बड़ी दुविधा में डाल दिया है मांजी ने,’’ रश्मि निराशा से बोली.
‘‘फ्लैट का क्या होगा. इस बार कदम वापस खींचे तो जिंदगी किराए के घरों में ही कटेगी,’’ मैं ने हताशाभरे स्वर में कहा.
‘‘इस वक्त इन्हें हमारी मदद करनी चाहिए थी. खैर, चिंता छोड़ो और 2 लाख रुपए भेज दो. जब फ्लैट लेने की ठान ली है तो कुछ न कुछ करेंगे,’’ उस ने समझाया.
‘‘ठीक है, तुम कहती हो तो...’’
मुझे लगा जैसे एक बड़े बैलून की हवा एक क्षण में निकाल दी गई हो. शरीर रुई सा हलका हो गया. लेकिन एक नई मुश्किल खड़ी हो गई कि कैसे 2 लाख रुपए की अतिरिक्त व्यवस्था की जाए.
किसी तरह मां को 2 लाख रुपए भेज दिए. कन्नू से अपनी जरूरत बताई तो वह टाल गया किंतु कुछ मित्रों ने आड़े समय मदद कर दी. समय पर रश्मि के पिता ने भी रुपए भेज दिए. इस तरह फ्लैट बुक हो गया. कुछ दिनों में बैंक से लोन भी पास हो गया. इस भागमभाग में शरीर थक सा गया. अब समस्या थी कर्ज चुकाने के साथ गृहस्थी चलाने की. कठिन समय था. रश्मि साइंस से ग्रेजुएट थी, सो उस ने कुछ ट्यूशन पकड़ लीं. एकएक दिन पहाड़ की तरह कठोर और लंबा लगता. खर्चों में कटौती, किस्तों की भरपाई करते हुए साल कट गया. रश्मि पगपग पर मेरा हौसला बढ़ाती रही.
साल बीतते ही फ्लैट का पजेशन मिल गया. ख्वाब सच हो गया. मन तितलियों के झुंड की तरह इधरउधर मंडराने लगा. जिंदगी के कैनवास में हम रुपहले रंग भरने को आतुर हो उठे. मैं 3 साल की निधि और रश्मि के साथ नए घर में प्रविष्ट हो गया. जितनी यादगार और उपयोगी वस्तुएं थीं, नए घर में सज गईं.
रश्मि घर की बालकनी में खड़ी थी. नया नजारा था, नई भोर थी और नया एहसास. उस का तनमन स्फूर्ति से भर उठा. विवाह के बाद उस के सपनों ने पहली बार अंगड़ाई ली थी. रश्मि भीतर ही भीतर प्रफुल्लित और रोमांचित थी जिस का मैं अनुभव कर रहा था. तभी पीछे से मैं ने उस का ध्यान अपनी ओर खींचा.
‘‘रश्मि, तुम्हारा कैसे धन्यवाद दूं,’’ मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.
‘‘इस में धन्यवाद वाली बात कहां आ गई,’’ वह मुसकराई.
‘‘तुम्हारा योगदान सब से बड़ा है, रश्मि. मैं पिताजी को बता देता हूं कि हम नए घर में आ गए हैं,’’ कह कर मैं ने फोन मिला दिया. उन्हें खुशखबरी दी तो उन की आवाज भर्रा गई, ‘‘बेटा, बहुतबहुत मुबारक हो. काश, कन्नू भी मकान खरीद पाता.’’
मैं चुप हो गया. दिल तो कह रहा था कि कह दूं कि आप लोग उसे खरीदने दो तब न. उस की पाईपाई तो तीर्थस्थानों के भ्रमण और आश्रम की भेंट चढ़ रही है. मैं न जाने कैसे इस काले जादू के प्रभाव से मुक्त हो गया. आज भी कन्नू का परिवार एक लो प्रोफाइल जगह में किराए के मकान में है. पत्नी उस की भी सुशील और शांत है. वह मुझ से अच्छा कमाता है फिर भी उस के पास कुछ नहीं है.
पिताजी से बात हुई. मां ने भी बधाई दी लेकिन तानों के साथ. मन दुखी हो गया.
यह 2 कमरों का घर था. जो सामान साथ लाए थे वह कमरों में ऐसे समा गया जैसे सागर में घड़ा भर पानी. रश्मि इधर आ कर घर की व्यवस्था के साथसाथ ट्यूशन भी ढूंढ़ने लगी. मैं दंग था कि रश्मि में कितना संयम और हौसला है. काफी दौड़धूप के बाद रश्मि को कामयाबी मिल ही गई. 1 माह तक 3 बच्चे ही आते रहे, फिर संख्या बढ़ गई. पुरानी जगह से यहां अच्छा रिस्पौंस मिल रहा था.
समय करवट बदल रहा था. भविष्य की रुपहली किरणों का प्रसार दिखाई पड़ने लगा था. मैं बैंक के कर्ज और दोस्तों की मदद वापस करने में जुट गया. जिंदगी की गाड़ी पटरी पर चलने लगी.
मां के फोन अब पहले से कम हो गए. इस फैसले से वे बेहद कुपित थीं. हर बार उन का क्रोध झलक उठता. रश्मि तो फोन बजते ही थरथर कांपनी शुरू हो जाती. इसलिए वह मुझ से ही फोन उठाने का आग्रह करती. इस से पहले वह कई बार अनावश्यक डांट खा चुकी थी.
आज छुट्टी का दिन था. मां का फोन आया तब मैं बालकनी में निधि के साथ बैठा था. रश्मि ने डरतेडरते फोन मुझे थमा दिया और भीतर चली गई.
‘‘मां, आप कैसी हो, कन्नू की भी छुट्टी होगी, क्या कर रहे हैं सब?’’ मैं ने पूछा.
‘‘आज घर में ही है. अगले सप्ताह हम सभी इलाहाबाद जा रहे हैं गंगा स्नान करने. तुम लोगों की इच्छा हो तो इलाहाबाद चले आओ. गुरु महाराज के आश्रम में कमरा मिलेगा. कोई परेशानी नहीं है,’’ मां एक सांस में पूरी बात कानों में उड़ेल गईं.
‘‘ओहो, मैं अगले सप्ताह से औडिट में व्यस्त रहूंगा. क्या कुछ दिन बाद प्रोग्राम नहीं बना सकते?’’ मैं ने असमर्थता बताई.
‘‘विशेष पर्वों पर ही गंगा स्नान का महत्त्व होता है. रश्मि ने तुझे अपनी तरह नास्तिक बना दिया है. धर्मकर्म सब भूल गए हो, और तो और, गुरु महाराज को भी नहीं याद करते.’’
‘‘ऐसी बात नहीं है, मां.’’
‘‘फ्लैट क्या खरीदा कि दिमाग सातवें आसमान पर चला गया है. तुम लोग मर्यादा तक भूल गए हो. लखनऊ से कितनी दूर है इलाहाबाद, मेरा फर्ज है कहना, बाकी फैसला तुम्हारा,’’ इतना कह कर मां ने फोन काट दिया.
मन क्षुब्ध हो गया. मां कितना वैमनस्य पालती हैं. हम ने तो हमेशा मातापिता का आदरसम्मान किया, कभी कटु शब्द नहीं बोले. उन के सुखदुख का खयाल रखा फिर भी दोनों भाइयों को अलगअलग तराजू से तौलती रहीं. फ्लैट खरीदा तो वह भी फूटी आंख न सुहाया.
मैं अगले दिन से ही औडिट की तैयारी में जुट गया. पता नहीं चला कि कब दिन निकला, कब डूब गया. लेकिन औडिट कुछ दिनों के लिए टल गया. मैं ने निश्चय किया कि हमें भी इलाहाबाद चलना चाहिए, इस बहाने आउटिंग भी हो जाएगी. निधि और रश्मि को भी बदलाव मिलेगा. इस आशय से रश्मि से बात की तो उस ने अनिच्छापूर्वक हामी भर दी. कन्नू से संपर्क किया तो पता चला कि वे लोग हैदराबाद से चल चुके थे और कल दोपहर तक इलाहाबाद पहुंच जाएंगे. हम लोग भी तैयारी में जुट गए. तय समय में हम तीनों भी इलाहाबाद पहुंच गए.
टे्रन आ चुकी थी. मैं रश्मि और निधि के साथ प्लेटफौर्म पर पहुंचा ही था कि निधि अपनी उंगलियों को छुड़ाती हुई चिल्लाई, ‘‘वे रहे दादादादी,’’ और दौड़ कर दादाजी से लिपट गई.
‘‘जय गुरुदेव, बच्चो,’’ मां ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया.
रश्मि ने बढ़ कर मां के पांव छूते हुए कहा, ‘‘प्रणाम, मांजी.’’
मां ने आंखें तरेरीं, ‘‘जय गुरुदेव बोलो, हम जो संस्कार दे रहे हैं उन पर चलोगे तभी कल्याण होगा.’’
‘‘बातें बाद में हो जाएंगी, पहले आश्रम पहुंचो,’’ पिताजी ने बहस का अंत करने का माध्यम ढूंढ़ा.
आश्रम तक पहुंचने का मार्ग पक्का था, सड़क के दोनों ओर छायादार व घने पेड़पौधे थे. मुख्यद्वार से सटी कई दुकानें थीं. पूजा सामग्री, भांतिभांति के वस्त्र, जड़ीबूटियां और गुरु महाराज के सान्निध्य में बनाई जाने वाली दवाओं, पत्रिकाओं इत्यादि से दुकानें सुसज्जित थीं. मां प्रसन्नचित्त हो कर हमारा मार्गदर्शन कर रही थीं. प्रवेशद्वार को पार करते ही आश्रम की भव्यता ने बरबस आंखें खींच लीं. हम लोग आगे बढ़ते रहे. पंक्तिबद्ध पीत वस्त्रधारी श्रद्धालु भजन गाते हुए जा रहे थे. लंबे भूभाग में कई भवन थे. गुरु भवन, गुरु कृपा भवन, गुरु तीर्थ भवन, गुरु वाणी भवन और उस के बाईं ओर गुरु नियंत्रण और व्यवस्था भवन थे. मैदान के ठीक सामने नवनिर्मित धर्मशालाएं थीं.
हमें सर्वप्रथम ठहरने की व्यवस्था करनी थी, इसलिए हम सभी व्यवस्थापक कक्ष की ओर चल दिए. कुरसी पर दाढ़ी वाला एक अधेड़ बैठा था. रेशमी भगवा कुरतापजामा पहने और रेशमी राम नाम की शौल ओढ़े बड़ा सा चंदन का टीका, बड़ीबड़ी आंखें और चेहरा कुटिलता से भरा प्रतीत हो रहा था. 2 युवतियां भगवा कपड़ों में उस के हाथ दबा रही थीं. एक सिर की मालिश कर रही थी.
‘‘जय गुरुदेव, क्या आप ही व्यवस्थापक हैं?’’ मां ने पूछा.
‘‘जय गुरुदेव. कहिए?’’ उस ने लंबी दाढ़ी पर हाथ घुमाते हुए कहा.
‘‘हम सभी बाहर से आए हैं. धर्मशाला में कमरा चाहिए,’’ पिताजी ने आने का प्रयोजन बताया.
‘‘फिलहाल कमरे तो खाली नहीं हैं. परसों गुरु पर्व है, यहां काफी गुरु परिवार हैं,’’ उस व्यक्ति ने कहा.
‘‘हम भी गुरु परिवार से हैं. चलने से पहले फोन भी किया था,’’ मां ने अधीर स्वर में कहा.
‘‘किया होगा, लेकिन जो पहले आ गए उन्हें तो देना ही पड़ेगा. यदि आप लोग शिविर में रहना चाहते हैं तो उस की व्यवस्था हो सकती है,’’ उस ने कहा.
‘‘हम ने धर्मशाला हेतु योगदान किया है. तब हम से कहा गया था कि जब कभी आप आश्रम में आएंगे आप को कमरा दिया जाएगा.’’
‘‘आप ने सहर्ष दान दिया होगा, आश्रम ने किसी को बाध्य नहीं किया है. जहां तक ठहरने का प्रश्न है वह आश्रम के नियमानुसार ही होगा,’’ उस व्यक्ति ने उठने का उपक्रम किया.
‘‘बच्चों का सुख छीन कर 5 लाख रुपए भेजे थे आश्रम के लिए. मेरे सम्मान के लिए एक कमरा भी नहीं है यहां,’’ मां ने क्रोध में तिलमिलाते हुए कहा.
दाढ़ी वाला व्यक्ति भड़क उठा, ‘‘5 लाख रुपए से एक कमरा नहीं बनता. दान देने वाले भक्त करोड़ों रुपए दे डालते हैं.’’
‘‘मुझे मत समझाओ. गुरु महाराज से कह कर हटवा भी सकती हूं तुम्हें,’’
मां ने चेतावनी भरे लहजे में कहा तो वह आगबबूला हो गया, ‘‘आप लोग सम्मानपूर्वक यहां से जाते हैं या धक्के मार कर भेजा जाए? फैसला आप लोगों पर है.’’
मां अपमान के घूंट पी कर रह गईं. दोनों बहुओं के सामने शर्म से पानीपानी हो गईं. चेहरा ग्लानिवश पीला पड़ गया था. क्रोध की ज्वाला भी रहरह कर आंखों से उठगिर रही थी. फिर थोड़ी ही देर में आंसुओं की अनवरत धारा बहने लगी.
पिताजी से नहीं रहा गया. उन का चेहरा तमतमा उठा, ‘‘अब खड़ीखड़ी क्या टेसुए बहा रही हो. सामान उठाओ और चलो यहां से. बहुत देख ली अपनी और बच्चों की बरबादी. मैं सहता रहा क्योंकि मैं एक कमजोर इंसान था. घर की सुखशांति की खातिर मौन रहा, यह मेरा अपराध है. मैं ही बच्चों की बरबादी का असली कारण हूं. आज तक मैं चुप रहा, अब नहीं रहूंगा.’’
मां ने आग्नेय दृष्टि पिताजी पर डाली. लेकिन उन के कड़े तेवर देख कर नरम पड़ गईं और फिर धीमे स्वर में बोलीं, ‘‘गुरु महाराज से इस व्यवस्थापक की शिकायत जरूरत करूंगी, देखना.’’
‘‘जैसा इसे निर्देश दिया होगा यह वैसा ही करेगा. मूर्ख तो हम थे जो अपनी मेहनत की जमापूंजी ऐसे ठगों पर लुटाते रहे. दुख इस बात का है कि बच्चों की नजर में हम गिर गए.’’
‘‘गुरु महाराज से मिलना ही पड़ेगा. आप नहीं जाते तो मैं जाऊंगी जरूर,’’ मां रोआंसी हो कर बोलीं.
‘‘तुम्हें जाना है जाओ. मैं तो वृद्धाश्रम जा रहा हूं और बच्चों को अपने विवेक से जीने की आजादी देता हूं. मैं यह भी चाहता हूं कि तुम भी बच्चों को खुली हवा में सांस लेने दो.’’
कन्नू मेरी तरफ देख रहा था, और मैं उस की. आज पहली बार पिताजी के इस रवैये ने हम सभी को अचंभित कर दिया था. मां की हर बात को पत्थर की लकीर मानने वाले आज खुद चट्टान की तरह सख्त हो गए थे.
‘‘पिताजी ठीक ही कह रहे हैं. जो हुआ सो हुआ. इस से हमें सीख लेनी चाहिए,’’ कन्नू की आंखों में आंसू झिलमिला उठे.
मैं ने कन्नू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘पिताजी कहीं नहीं जाएंगे, हमारे साथ ही रहेंगे. हमें विकास के रास्ते पर जाना है, तबाही के नहीं. इसलिए हमारी पहली प्राथमिकता रुचि के लिए रिश्ता ढूंढ़ने की रहेगी.’’
‘‘हां भैया, आप ठीक कहते हो. अब बहुत हो गया. भाभी ने आप को इस दलदल से बाहर निकाला है, अब हमारा भी मार्गदर्शन करो. मांपिताजी के प्रति हमारी श्रद्धा आज भी है, कल भी रहेगी. किंतु ऐसे दलदल में हम कभी पैर
नहीं रखेंगे, जहां से पतन का रास्ता निकलता हो.’’
मां की मुखाकृति सामान्य होती जा रही थी. दोनों बहुओं के कपोल खुशी से दमक रहे थे. रुचि ने बढ़ कर मां का हाथ अपने दोनों हाथों से ढक लिया. उधर, कन्नू बोलता ही जा रहा था, ‘‘इन साधुअसाधु में फर्क करना हमारे बूते में नहीं है. बहुत हो गया, अब हम और नहीं लुटेंगे.’’
‘‘अब चलो, होटल चलते हैं जहां खर्चा तो होगा लेकिन ठाट से रहेंगे. कल सुबह हम नदी की सैर करेंगे और पिछली भूलों को उस गंदे नाले में बहा देंगे.’’
मेरे इतना कहते ही सब ने अपनाअपना सामान उठाया और आगे बढ़ गए एक नई राह पर. द्य
जीवन में सफलताअसफलता मेहनत और पुरुषार्थ पर निर्भर है. इच्छाएं कभी थोड़े से परिश्रम से पूरी हो जाती हैं, कभी कठिनाई से लेकिन उस तरह नहीं जैसे हमारा परिवार चाहता था.

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